बोलता सच,मथुरा : मशहूर संगीतकार और ऑस्कर विजेता एआर रहमान द्वारा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को ‘कम्युनल’ बताए जाने के बाद यह विवाद और गहराता जा रहा है। अब इस मुद्दे पर आध्यात्मिक गुरु कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने रहमान के बयान को अहसानफरामोशी करार देते हुए कहा कि जिस इंडस्ट्री ने उन्हें पहचान और सम्मान दिलाया, उसी पर आज सवाल उठाए जा रहे हैं।
दरअसल, एआर रहमान ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि बीते कुछ वर्षों में बॉलीवुड में सांप्रदायिक सोच बढ़ी है, जिसकी वजह से उन्हें काम मिलने में कठिनाई हो रही है। इस बयान के बाद सियासी और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई। मथुरा में मीडिया से बातचीत के दौरान देवकीनंदन ठाकुर से जब इस पर सवाल किया गया, तो उन्होंने साफ शब्दों में अपनी नाराजगी जाहिर की।
देवकीनंदन महाराज ने कहा, “मैं व्यक्तिगत रूप से बॉलीवुड को पसंद नहीं करता, लेकिन जिस मंच ने आपको इतना बड़ा कलाकार बनाया, आज उसी को गाली देना सही नहीं है। यह वही बात हो गई कि जिस थाली में खाया, उसी में छेद कर दिया।” उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान उन लोगों की हताशा को दिखाते हैं, जो अपनी असफलताओं का कारण दूसरों पर थोपते हैं।
महाराज ने मीडिया की भूमिका पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि अगर वह इस विषय पर खुलकर बोलेंगे तो उसे अलग ही रंग दे दिया जाएगा। “अगर मैं कुछ कह दूं तो तुरंत कहा जाएगा कि इनके बिना हिंदू-मुसलमान के रोटी नहीं चलती। लेकिन सच यह है कि कुछ लोग अपनी नाकामी छिपाने के लिए सांप्रदायिकता का सहारा लेते हैं,” उन्होंने कहा।
देवकीनंदन ठाकुर ने सनातन धर्म और युवा पीढ़ी की भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज सनातनी समाज जागरूक हो रहा है और युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। “हम सनातनियों को आगे लाने के लिए पुरस्कार दे रहे हैं, सनातन प्रीमियर लीग (SPL) जैसे आयोजन करा रहे हैं, ताकि युवा अपनी जड़ों को समझें। जब तक युवा अपने धर्म और संस्कृति को नहीं जानेंगे, तब तक ऐसे बयानों का असर बना रहेगा,” उन्होंने कहा।
गौरतलब है कि एआर रहमान ने अपने बयान में यह संकेत दिया था कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सत्ता और सोच के बदलाव के चलते एक तरह की ‘मिलीभगत’ पैदा हो गई है, जिससे कुछ कलाकारों को काम से दूर किया जा रहा है। हालांकि, देवकीनंदन ठाकुर के तीखे पलटवार के बाद यह मुद्दा अब केवल सिनेमा तक सीमित न रहकर सामाजिक और वैचारिक बहस का रूप ले चुका है।
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