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रामायण कथा: त्रिजटा ने बताया वह रहस्य जिसने कराया रावण का अंत

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Ramayana Story Told by Trijata

बोलता सच,धार्मिक : रामायण की कथा के अनुसार लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर उन्हें अशोक वाटिका में कैद कर रखा था। इसके बाद राम-रावण युद्ध हुआ, जो केवल सीता माता की मुक्ति के लिए ही नहीं बल्कि असत्य पर सत्य की विजय का भी प्रतीक माना जाता है। युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब रावण के कटे हुए सिर और भुजाएँ बार-बार पुनः जुड़ जाते थे, जिससे भगवान श्रीराम भी तुरंत उसका वध नहीं कर पा रहे थे। यह देखकर अशोक वाटिका में बैठीं सीता माता व्याकुल हो उठीं। तभी विभीषण की पुत्री त्रिजटा ने एक ऐसा रहस्य बताया, जिसके बाद घटनाक्रम बदल गया।


विष्णुभक्त त्रिजटा का मईया सीता को आश्वासन

त्रिजटा रावण के भाई विभीषण की बेटी थीं और विष्णु की परम भक्त मानी जाती थीं। राक्षसी कुल में जन्म लेने के बावजूद उनमें विवेक, करुणा और संतुलित व्यवहार के गुण थे। रावण भी उनकी बात का सम्मान करता था। जब सीता माता अशोक वाटिका में थीं, त्रिजटा उन्हीं की देखरेख में शामिल थीं और मईया की पीड़ा को भली-भांति समझती थीं।

युद्ध की स्थिति सुनकर जब सीता माता चिंतित हुईं, तब त्रिजटा ने कहा कि रावण का सिर और भुजाएँ इसलिए पुनः जुड़ जाती हैं क्योंकि भगवान राम उसके हृदय पर बाण नहीं चला रहे हैं। इसके पीछे एक दिव्य रहस्य छिपा था।


क्यों नहीं चला रहे थे श्रीराम रावण के हृदय पर बाण?

त्रिजटा ने माता सीता को बताया कि श्रीराम रावण के हृदय पर प्रहार इसलिए नहीं कर रहे थे क्योंकि रावण के हृदय में सीता माता का ध्यान वास करता था। यदि प्रभु राम हृदय पर बाण चला देते तो इसमें जानकीजी को भी क्षति पहुँच सकती थी और साथ ही, यह समस्त सृष्टि के लिए विनाशकारी हो सकता था। रावण यह जानता था कि सीता माता लक्ष्मी का स्वरूप हैं, इसलिए वह जानकीजी का ध्यान अपने हृदय में बसाए रखता था। यह सुनकर माता सीता चौंक गईं। तब त्रिजटा ने कहा कि जैसे ही रावण का मन सीता के ध्यान से हटेगा, उसका अंत निश्चित है।


विभीषण ने बताया अमृत का रहस्य—यही बना रावण के अंत का मार्ग

विभीषण ने श्रीराम को बताया कि रावण की नाभि में अमृत का स्रोत है, जिसके कारण उसका वध संभव नहीं हो पा रहा। तब प्रभु श्रीराम ने रावण की नाभि पर तीर चलाकर उस अमृत को सुखा दिया। इस प्रहार से रावण का मन विचलित हुआ और एक क्षण के लिए उसका ध्यान सीता माता से हट गया।

उसी अवसर का लाभ उठाकर भगवान राम ने अगस्त्य मुनि द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र से रावण के हृदय पर प्रहार किया और इसी के साथ लंकापति रावण का अंत हो गया। इस प्रकार असत्य पर सत्य की अंतिम विजय स्थापित हुई।


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