पुलिस के अनुसार, इस रैकेट का सरगना शिवम अग्रवाल नाम का युवक है, जो पेशे से एंबुलेंस ड्राइवर है लेकिन खुद को डॉक्टर बताकर लोगों का भरोसा जीतता था। हाल ही में एक अफ्रीकी महिला का ट्रांसप्लांट होने से इस नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय लिंक होने की आशंका भी जताई जा रही है।
60 लाख से 1 करोड़ तक वसूली
गिरोह बेहद संगठित तरीके से काम करता था। डायलिसिस सेंटरों पर नजर रखकर गंभीर मरीजों को निशाना बनाया जाता था और उन्हें 60 लाख से 1 करोड़ रुपये में अवैध ट्रांसप्लांट का लालच दिया जाता था। डोनर भी पैसों के लालच में तैयार किए जाते थे। एक मामले में बिहार का MBA छात्र 10 लाख रुपये के बदले किडनी देने को तैयार हो गया, जबकि मरीज से 80 लाख रुपये वसूले गए।
बिना रिकॉर्ड के होते थे ऑपरेशन
जांच में खुलासा हुआ है कि ऑपरेशन के दिन अस्पताल का सामान्य स्टाफ हटा दिया जाता था और विशेष सर्जिकल टीम बुलाकर ट्रांसप्लांट किया जाता था। इसके बाद मरीजों को तुरंत अलग-अलग स्थानों पर भेज दिया जाता था। न तो मरीजों का कोई स्थायी मेडिकल रिकॉर्ड रखा जाता था और न ही ऑपरेशन की आधिकारिक एंट्री की जाती थी, ताकि कोई सबूत न मिले।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ा था नेटवर्क
यह रैकेट डिजिटल माध्यमों पर भी सक्रिय था। Telegram पर बनाए गए ग्रुप के जरिए डोनर और रिसीवर को आपस में जोड़ा जाता था। मेरठ के एक डॉक्टर के जरिए यह नेटवर्क संचालित किया जा रहा था।
महिला मरीज की हालत गंभीर
80 लाख रुपये खर्च करने के बावजूद मेरठ की महिला की हालत गंभीर बनी हुई है। संक्रमण के चलते उसे संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) में भर्ती कराया गया है। वहीं, किडनी देने वाले बिहार के युवक की हालत भी खराब बताई जा रही है और डॉक्टरों की टीम उसका इलाज कर रही है।
यह मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था, अस्पतालों की निगरानी और अवैध अंग तस्करी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।