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पनामा नहर पर बढ़ता अमेरिका-चीन टकराव, भारत समेत दुनिया की बढ़ीं चिंताएं

Bolta Sach News
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America advancing on the Panama Canal
बोलता सच,नई दिल्ली : अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच वैश्विक व्यापार के एक और अहम मार्ग, पनामा नहर, को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव तेज हो गया है। पहले से ही होर्मुज स्ट्रेट में बाधाओं के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिससे पेट्रोलियम कीमतों में उछाल देखा जा रहा है। ऐसे में पनामा नहर को लेकर उभरा नया विवाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए चिंता का विषय बन गया है।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब पनामा के सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत और अटलांटिक महासागर के प्रवेश द्वार पर स्थित बाल्बोआ और क्रिस्टोबाल बंदरगाह टर्मिनलों के संचालन से जुड़े करार को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद पनामा ने इन रणनीतिक बंदरगाहों पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर लिया।

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने चीन पर आरोप लगाया है कि वह पनामा के झंडे वाले जहाजों को अपने बंदरगाहों पर रोककर आर्थिक दबाव बना रहा है। उनका कहना है कि इस तरह की गतिविधियां वैश्विक व्यापार प्रणाली को प्रभावित कर सकती हैं और इससे लागत बढ़ेगी, जिसका असर दुनियाभर के उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

वहीं, चीन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पलटवार किया है। चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका खुद पनामा नहर पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और इस मुद्दे को राजनीतिक रूप दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव केवल बंदरगाहों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे बड़ी भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा छिपी है। ईरान युद्ध के चलते अमेरिका और चीन के संबंध पहले ही तनावपूर्ण हैं। चीन पर ईरान को समर्थन देने के आरोप हैं, जबकि चीन कच्चे तेल के व्यापार में डॉलर की जगह युआन को बढ़ावा दे रहा है, जिससे ‘पेट्रोडॉलर बनाम पेट्रोयुआन’ की प्रतिस्पर्धा भी सामने आ रही है।

पनामा नहर, जो 1914 में शुरू हुई थी, अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। हर साल करीब 14,000 जहाज इस नहर से गुजरते हैं और यह वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 5 प्रतिशत संभालती है। इस मार्ग के जरिए जहाज हजारों किलोमीटर की दूरी और समय की बचत करते हैं।

भारत के लिए भी पनामा नहर बेहद अहम है। भारत से अमेरिका और अन्य प्रशांत देशों के लिए जाने वाले जहाज इस नहर का उपयोग करते हैं, जिससे लंबा और महंगा समुद्री रास्ता टल जाता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो भारतीय व्यापार की लागत और समय दोनों बढ़ सकते हैं।

पनामा में चीनी कंपनियों की मजबूत उपस्थिति भी इस विवाद को और संवेदनशील बनाती है। हाल के वर्षों में चीन ने नहर से जुड़े बंदरगाहों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है और वह अमेरिका के बाद इस नहर का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पनामा नहर सिर्फ एक जलमार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बनती जा रही है, जहां महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज होती जा रही है।


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