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10 दिन डीप फ्रीजर में रहेगा बौद्ध गुरु का शव:भदंत ज्ञानेश्वर के अंतिम दर्शन करने म्यांमार के राजदूत कुशीनगर पहुंचे

Bolta Sach News
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Will keep in deep freezer for 10 days

बोलता सच ,कुशीनगर। बौद्ध भिक्षु संघ के अध्यक्ष भदंत ज्ञानेश्वर महास्थविर का पार्थिव शरीर शुक्रवार रात करीब 10 बजे कुशीनगर के म्यांमार मंदिर पहुंचा। वहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मंदिर परिसर में उनके पार्थिव शरीर को एक फ्रीजर बॉक्स में रखा गया है ताकि देश-विदेश से आने वाले बौद्ध अनुयायी 10 नवंबर तक अंतिम दर्शन कर सकें।

11 नवंबर को नगर भ्रमण के बाद भदंत ज्ञानेश्वर का अंतिम संस्कार बौद्ध परंपरा के अनुसार म्यांमार मंदिर परिसर में किया जाएगा। श्रद्धालुओं के अनुसार, यह वही स्थान है जहां वे अक्सर ध्यान लगाया करते थे। शुक्रवार रात से ही मंदिर परिसर में भक्तों, भिक्षुओं और अनुयायियों की भारी भीड़ जुटने लगी। डीएम और एसपी समेत कई अधिकारी भी म्यांमार मंदिर पहुंचे और उन्हें श्रद्धांजलि दी। म्यांमार के राजदूत जाउ ओलीन और प्रसिद्ध गायिका-अभिनेत्री चो प्योने ने भी कुशीनगर पहुंचकर गुरुजी के अंतिम दर्शन किए।


भिक्षु बोले — “गुरुजी हर बार लौट आते थे, पर इस बार नहीं”

भंते अशोक ने बताया कि भदंत ज्ञानेश्वर हमेशा बीमारी से स्वस्थ होकर लौट आते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा, “अंतिम समय में गुरुजी कुछ कहना चाहते थे, पर ऑक्सीजन मास्क लगा होने के कारण बोल नहीं सके। हमने उन्हें कागज-कलम भी दिया, पर वे लिख नहीं पाए। उनकी अंतिम बातें उनके साथ ही चली गईं।”

भदंत ज्ञानेश्वर की तबीयत 11 अक्टूबर को अचानक बिगड़ गई थी। पहले उन्हें गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत गंभीर होने पर उन्हें मेदांता अस्पताल, लखनऊ रेफर किया गया। लगभग 20 दिन तक इलाज चलने के बाद उन्होंने शुक्रवार सुबह 4:50 बजे अंतिम सांस ली।


जन्मदिन पर अंतिम दर्शन और विशेष पूजा

भदंत ज्ञानेश्वर का जन्म 10 नवंबर को हुआ था। इस अवसर पर मंदिर में उनके सम्मान में विशेष धम्म देशना (बौद्ध प्रवचन), पूजा और ध्यान कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। 8 नवंबर को वर्मा के संघ नायक धर्मगुरु भिक्षु ज्ञानेश्वर (वर्मा) कुशीनगर पहुंचेंगे और विशेष प्रवचन देंगे।

भंते महेंद्र ने बताया कि 10 नवंबर को बुद्ध पीजी कॉलेज के मुख्य द्वार का उद्घाटन गुरुजी के नाम पर किया जाएगा। इसके बाद 11 नवंबर को नगर भ्रमण के बाद करीब 2 बजे म्यांमार मंदिर परिसर में ही उनका दाह संस्कार किया जाएगा। इसी स्थल पर बाद में उनकी समाधि और स्तूप बनाया जाएगा ताकि अनुयायी वहां दर्शन कर सकें।


“जीवन को बोतल की तरह स्वच्छ रखो” — गुरुजी की शिक्षा

भंते नंदरतन ने गुरुजी के प्रेरक विचारों को याद करते हुए कहा कि उनका प्रिय वाक्य था, “जीवन कांच की बोतल जैसा है — पारदर्शी और निर्मल। समाज की कुरीतियां और द्वेष उस पर रंग चढ़ा देते हैं, इसलिए मन को सदा साफ और स्वच्छ रखना चाहिए।”

उन्होंने बताया कि गुरुजी की अंतिम इच्छा थी कि उनका पार्थिव शरीर मंदिर परिसर में रखा जाए, नगर भ्रमण कराया जाए और वहीं दाह संस्कार हो, जहां वे ध्यान करते थे। प्रमुख सेविका नंदिका ने भावुक होकर कहा, “गुरुजी को एहसास हो गया था कि वे अब नहीं रहेंगे। उन्होंने मुझसे कहा था — जल्दी-जल्दी मेरा फोटो खींच लो।”

व्यवस्थाओं में भंते महेंद्र, भंते नंदरतन, भंते उपाली, भंते अशोक और टी.के. राय (दादा नगीना) लगातार जुटे रहे।


पहले भारतीय जिन्हें मिला म्यांमार का सर्वोच्च सम्मान

भदंत ज्ञानेश्वर महास्थविर न केवल एक आध्यात्मिक गुरु थे बल्कि साहित्य, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय थे। उन्हें म्यांमार के सर्वोच्च धार्मिक सम्मान ‘अभिधज्जा महारथ गुरु’ से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। म्यांमार सरकार ने उन्हें यह उपाधि सन् 2021 में प्रदान की थी।

उन्होंने बौद्ध धर्म, शिक्षा और कुशीनगर के विकास पर कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘भदंत ज्ञानेश्वर महास्थविर — जीवन एवं कृतित्व’ प्रमुख है।


बर्मा से आए, कुशीनगर में फैलाया बौद्ध प्रकाश

भदंत ज्ञानेश्वर का जन्म 1936 में बर्मा (म्यांमार) में हुआ था। 1963 में वे भारत आए और कुशीनगर में वर्मा बुद्ध मंदिर की स्थापना की। वर्ष 1977 में भारत सरकार ने उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की। तब से उन्होंने अपना जीवन बुद्ध की शिक्षाओं और मानवता की सेवा को समर्पित कर दिया।

उनके निधन से कुशीनगर सहित पूरे बौद्ध जगत में शोक की लहर है। अनुयायी कह रहे हैं — “गुरुजी ने पूर्वांचल में धम्म का दीप जलाया था। आज वह दीप भले बुझ गया, लेकिन उसकी रोशनी हमारी राहें हमेशा उजागर करती रहेगी।”


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