रजनी रानी लंबे समय से अपने प्रमोशन के अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में पदक जीतने के बावजूद उन्हें रेलवे की नीति के तहत मिलने वाले आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन का लाभ नहीं दिया गया।
2016 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला
रजनी रानी से जुड़ा यह मामला नवंबर 2016 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस पर आखिरी बार जनवरी 2017 में सुनवाई हुई थी। करीब एक दशक से लंबित मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई का रास्ता साफ किया है। रेलवे की नीति के मुताबिक राष्ट्रीय और अन्य निर्धारित स्तर की खेल प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को ‘आउट-ऑफ-टर्न’ प्रमोशन देने का प्रावधान है। रजनी रानी का दावा है कि उन्होंने इस नीति के तहत निर्धारित योग्यता पूरी की थी।
CAT के निर्देश के बाद भी नहीं मिला प्रमोशन
रजनी रानी के मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) ने वर्ष 2012 में उनके पक्ष पर विचार करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद रेलवे ने वर्ष 2013 में उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद रजनी रानी ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया। हालांकि, वर्ष 2016 में हाई कोर्ट ने उनकी याचिका तकनीकी आधार पर खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और नवंबर 2016 से वहां लंबित है।
2005 में प्रमोशन मिलने का किया दावा
रजनी रानी का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने के बाद उन्हें वर्ष 2005 में ही पहला प्रमोशन मिल जाना चाहिए था। रेलवे ने प्रमोशन से इनकार करते हुए तर्क दिया कि जिन चार प्रतियोगिताओं में उन्होंने हिस्सा लिया था, उनमें से एक प्रतियोगिता निर्धारित राष्ट्रीय स्तर की पात्रता पूरी नहीं करती थी। महिला खिलाड़ी का दावा है कि नियमों में केवल दो निर्धारित प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की शर्त थी और उन्होंने यह योग्यता पूरी की थी।
एक गोल्ड और एक ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकी हैं रजनी
रजनी रानी के मुताबिक उन्होंने जुलाई 2004 में 44वीं सीनियर नेशनल इंटर-स्टेट प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल किया था। इसके अलावा फरवरी 2005 में 52वीं नॉर्दर्न रेलवे एथलेटिक मीट में ब्रॉन्ज मेडल जीता।
उन्होंने सितंबर 2004 में मुंबई में आयोजित ओपन नेशनल प्रतियोगिता में रेलवे का प्रतिनिधित्व करते हुए चौथा स्थान भी हासिल किया था। अब सुप्रीम कोर्ट में 21 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर रजनी रानी की नजरें टिकी हैं। करीब दो दशक से रेलवे में सेवा देने के बाद उनकी लड़ाई अब इस बात पर केंद्रित है कि राष्ट्रीय स्तर पर हासिल की गई खेल उपलब्धियों के आधार पर उन्हें प्रमोशन का लाभ मिलेगा या नहीं।