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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: फांसी पर रोक नहीं, वैकल्पिक तरीकों की जांच का रास्ता खुला

Bolta Sach News
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Big decision of Supreme Court

बोलता सच,नई दिल्ली : मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी देने के तरीके को बदलने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फांसी को खत्म करने की मांग खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने केंद्र सरकार को विशेषज्ञों की मदद से मौत की सजा देने के वैकल्पिक तरीकों की संभावना तलाशने की छूट दी है।

याचिका में दलील दी गई थी कि फांसी के दौरान कैदी को दर्द और मानसिक पीड़ा हो सकती है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार से जुड़ा सवाल है। याचिकाकर्ता ने जहरीले इंजेक्शन, गोली, बिजली या गैस जैसे विकल्पों पर विचार करने की मांग की थी।

कानून में फांसी का प्रावधान बरकरार

मौजूदा कानून के तहत मौत की सजा देने के लिए फांसी का प्रावधान जारी है। पुराने CrPC की धारा 354(5) में इसका प्रावधान था, जबकि नए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5) में भी फांसी का उल्लेख है। सुप्रीम कोर्ट 1983 के Deena मामले में फांसी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रख चुका है।

केंद्र सरकार तलाश सकती है विकल्प

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र चाहे तो विशेषज्ञ समिति गठित कर मौत की सजा के वैकल्पिक तरीकों का वैज्ञानिक और चिकित्सकीय मूल्यांकन करा सकता है। यदि भविष्य में ठोस मेडिकल या वैज्ञानिक प्रमाण सामने आते हैं, तो फांसी के तरीके की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार की संभावना बनी रहेगी।

लेथल इंजेक्शन पर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान वैकल्पिक तरीकों पर भी चर्चा हुई। 2003 में विधि आयोग ने घातक इंजेक्शन को फांसी के संभावित विकल्प के रूप में सुझाया था। हालांकि, Project 39A ने दूसरे देशों, विशेषकर अमेरिका में लेथल इंजेक्शन के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि यह तरीका भी विवादों से मुक्त नहीं है।

फिलहाल निष्कर्ष यही है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भारत में मौत की सजा देने का मौजूदा तरीका नहीं बदला है। लेकिन कम पीड़ा और अधिक गरिमा वाले विकल्पों पर भविष्य में विचार का रास्ता खुला हुआ है।


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