इस घटनाक्रम पर लखनऊ में ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे ईरान की “फतह” बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका अब सुपर पावर नहीं रहा और ईरान ने मजबूती के साथ मुकाबला किया है। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की आलोचना करते हुए कहा कि ईरान और इस्लाम को खत्म करने की बात कही गई थी, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका।
यासूब अब्बास ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि जिस तरह अतीत में कठिन परिस्थितियों में जीत हासिल की गई, उसी तरह ईरान ने भी अपने विरोधियों के खिलाफ मजबूती दिखाई। उन्होंने इस मौके पर मुस्लिम समुदाय, विशेषकर शिया समुदाय को मुबारकबाद भी दी।
वहीं, लखनऊ के ही प्रमुख धर्मगुरु मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने इस सीजफायर का स्वागत करते हुए इसे समय की जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि इस युद्धविराम से न केवल ईरान के लोगों को राहत मिलेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर बढ़ते खतरे को भी कम किया जा सकेगा।
उन्होंने आगे कहा कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता और इसमें सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह सीजफायर स्थायी शांति की दिशा में एक कदम साबित होगा और दोनों देशों के बीच स्थायी समझौता हो सकेगा।
धर्मगुरुओं की इन अलग-अलग प्रतिक्रियाओं से साफ है कि जहां एक ओर कुछ लोग इसे एक पक्ष की जीत के रूप में देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शांति और संवाद को ही आगे का रास्ता माना जा रहा है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि यह सीजफायर स्थायी शांति में बदलता है या नहीं।