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गाजियाबाद का हरीश राणा केस: 10 साल के संघर्ष के बाद इच्छामृत्यु, परिवार की दर्दभरी कहानी

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Ghaziabad's Harish Rana case
बोलता सच,गाजियाबाद : उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन निवासी हरीश राणा का मामला देशभर में चर्चा का विषय बना रहा। एक युवा इंजीनियरिंग छात्र की जिंदगी, एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई और अंततः अदालत की अनुमति से ‘पैसिव यूथेनेशिया’ के जरिए उसका दुखद अंत हुआ।
हरीश राणा का जन्म 1993 में दिल्ली में हुआ था। वह पढ़ाई में होनहार थे और Panjab University में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन 20 अगस्त 2013 को एक हादसे में वह पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उन्हें ‘क्वाड्रिप्लेजिया’ से ग्रस्त बताया और वे वेजिटेटिव स्टेट में चले गए।
करीब 10 साल तक हरीश के माता-पिता ने उम्मीद नहीं छोड़ी। उन्होंने बेटे की देखभाल में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। हर महीने करीब 70 हजार रुपये का खर्च उठाया, यहां तक कि 2021 में अपना मकान भी बेचना पड़ा। पिता अशोक राणा ने नौकरी छोड़ दी, ताकि बेटे की सेवा कर सकें।
जब वर्षों तक कोई सुधार नहीं हुआ, तो माता-पिता ने 2022 में Delhi High Court में इच्छामृत्यु की याचिका दायर की, जिसे 2024 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद मामला Supreme Court of India पहुंचा।
11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। इसके बाद AIIMS Delhi में प्रक्रिया पूरी की गई।
करीब 8 दिनों की प्रक्रिया के बाद 24 मार्च को हरीश राणा ने अंतिम सांस ली। 25 मार्च को उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट पर किया गया।
इस घटना ने न केवल एक परिवार के दर्द को उजागर किया, बल्कि इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी देशभर में नई बहस छेड़ दी। राजनगर एक्सटेंशन की सोसायटी में रहने वाले लोग मानते हैं कि यह मामला भविष्य में ऐसे कानूनी फैसलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगा।
हरीश राणा अब सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि कानून, चिकित्सा और मानवीय संवेदनाओं के जटिल सवालों का प्रतीक बन गए हैं।

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