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यमुना प्रदूषण पर सख्ती: अवैध जींस डाइंग यूनिट पर 10 लाख का जुर्माना, NGT में DPCC ने कार्रवाई को ठहराया जायज

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Strictness on Yamuna pollution
बोलता सच,नई दिल्ली : यमुना नदी को प्रदूषित करने वाले अवैध उद्योगों के खिलाफ दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) ने सख्त रुख अपनाया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल अपनी रिपोर्ट में डीपीसीसी ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले उद्योगों के खिलाफ किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरती जाएगी।
डीपीसीसी ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के गढ़ी मांडू गांव में संचालित एक अवैध जींस डाइंग और वाशिंग यूनिट पर लगाए गए 10 लाख रुपये के पर्यावरण क्षति मुआवजे को पूरी तरह वैध और कानूनी करार दिया है।
यह मामला अक्टूबर 2024 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पर्यावरणविद एवं याचिकाकर्ता वरुण गुलाटी की शिकायत के बाद सामने आया था। शिकायत के आधार पर डीपीसीसी, एमसीडी, दिल्ली पुलिस और अन्य संबंधित विभागों की संयुक्त टीम ने गढ़ी मांडू में छापेमारी की।
जांच के दौरान पाया गया कि यूनिट बिना किसी वैधानिक अनुमति और प्रदूषण नियंत्रण स्वीकृति के जींस की रंगाई और धुलाई का काम कर रही थी। निरीक्षण में यह भी सामने आया कि फैक्टरी से निकलने वाला रासायनिक और जहरीला अपशिष्ट जल बिना किसी इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) के सीधे नालों में छोड़ा जा रहा था, जो अंततः यमुना नदी में पहुंच रहा था।
डीपीसीसी ने एनजीटी को बताया कि जुर्माने की राशि अब तक जमा नहीं होने पर करावल नगर के एसडीएम को भू-राजस्व की तरह इसकी वसूली करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। इस संबंध में संबंधित अधिकारियों को दोबारा रिमाइंडर भी भेजा गया है।
समिति के अनुसार, यूनिट से निकलने वाले रसायन पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं। इसी आधार पर इसे ‘रेड कैटेगरी’ का प्रदूषण फैलाने वाला उद्योग मानते हुए 10 लाख रुपये का पर्यावरण क्षति मुआवजा लगाया गया।
हालांकि, पर्यावरणविद एवं याचिकाकर्ता वरुण गुलाटी का दावा है कि दिल्ली में अब भी करीब 500 अवैध जींस डाइंग यूनिट संचालित हो रही हैं। उनका कहना है कि इनमें से अधिकांश इकाइयों पर न तो पर्यावरण क्षति मुआवजा लगाया गया है और न ही उन्हें सील किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि रिहायशी इलाकों में चल रही ऐसी इकाइयों के खिलाफ भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही, जबकि इनसे लगातार प्रदूषण फैल रहा है।

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