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प्रलय मिसाइल अब पूरी तरह स्वदेशी INDIGIS सिस्टम से लैस होगी, भारत ने शुरू की पूर्ण डिजिटल आत्मनिर्भरता की प्रक्रिया

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Pralay missile is now completely indigenous

बोलता सच,नई दिल्लीः भारत ने प्रलय टैक्टिकल क्वाज़ी-बैलिस्टिक सिस्टम को अब पूर्णत: स्वदेशी जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम INDIGIS से लैस करने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह वही सिस्टम है जिसका मूल विकास DRDO की लेबोरेटरी—सेंटर फ़ॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड रोबोटिक्स (CAIR)—ने किया था। इसके शामिल होने के बाद प्रलय मिसाइल हार्डवेयर, गाइडेंस और डिजिटल मिशन-प्लानिंग—तीनों स्तरों पर 100% भारतीय तकनीक पर आधारित हो जाएगी। इसे रणनीतिक स्वावलंबन की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

युद्धक्षेत्र डेटा की सटीक डिजिटल मैपिंग संभव

इस इंटिग्रेशन से मिसाइल बैटरी के कमांडरों को एक सुरक्षित, मजबूत और ऑफलाइन ऑपरेट होने वाला डिजिटल मैपिंग प्लेटफॉर्म मिलेगा। इस सिस्टम पर लॉन्चर की स्थिति, मिसाइल के प्रकार, लक्ष्य फोल्डर, रेंज रिंग्स और युद्ध-क्षेत्र से जुड़े सभी महत्वपूर्ण डेटा को सटीक रूप से देखा और विश्लेषित किया जा सकेगा। सबसे अहम बात यह कि अब मिशन-प्लानिंग किसी विदेशी सॉफ्टवेयर पर नहीं, बल्कि भारतीय प्रणाली पर होगी। इससे डेटा लीक, बैकडोर एक्सेस या संकट की स्थिति में सेवा बाधित होने जैसी सभी संभावित जोखिम समाप्त हो जाते हैं।

दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों को नष्ट करने में प्रलय होगी और सक्षम

अब तक कई सैन्य प्रणालियां विदेशी GIS इंजन पर निर्भर रहीं, लेकिन प्रलय जैसी मिसाइल—जो संघर्ष की शुरुआत में ही दुश्मन के अहम ठिकानों पर प्रहार करने में सक्षम है—के लिए सेना और DRDO ने स्वदेशी GIS को अनिवार्य माना। इसी जरूरत को देखते हुए DRDO ने लंबे परीक्षणों के बाद INDIGIS सिस्टम का ट्रांसफ़र ऑफ़ टेक्नोलॉजी बेंगलुरु की MicroGenesis TechSoft Pvt Ltd को दिया। कंपनी ने इसे प्रलय की जरूरतों के हिसाब से कस्टमाइज़ करते हुए एक पूर्ण डेस्कटॉप GIS वातावरण तैयार किया, जिससे यूनिट्स एक समान मैप फॉर्मेट विकसित कर सकें और युद्धक्षेत्र का अध्ययन तेज़, सरल और अधिक सटीक हो सके।

150 से 500 किलोमीटर की रेंज, क्वाज़ी-बैलिस्टिक उड़ान

प्रलय मिसाइल 150 से 500 किलोमीटर तक की दूरी पर प्रहार करने में सक्षम है। इसका क्वाज़ी-बैलिस्टिक पथ बीच उड़ान में दिशा बदल सकता है, जिससे इंटरसेप्शन की कोशिशें विफल हो जाती हैं। इसे मोबाइल लॉन्चर्स से दागा जाता है जो ‘शूट-एंड-स्कूट’ रणनीति के तहत लगातार स्थान बदलते रहते हैं। ऐसे ऑपरेशन में कमांडरों को ऐसा सिस्टम चाहिए जो रियल-टाइम में लॉन्चर की लोकेशन दिखा सके, वारहेड के अनुसार रेंज-विश्लेषण कर सके, टेरेन मास्किंग बता सके, फायरिंग के बाद नई सुरक्षित राह सुझा सके और दुश्मन के रडार तथा तोपखाना कवरेज का ओवरले दिखा सके। INDIGIS इन सभी क्षमताओं को ऐसे सुरक्षित प्लेटफ़ॉर्म में उपलब्ध कराता है जो उपग्रह लिंक बाधित होने पर भी विश्वसनीय रूप से काम करता रहे।

भारत ने हासिल किया रणनीतिक ‘ट्राइफेक्टा’

INDIGIS के प्रलय में शामिल होने के साथ ही भारत ने एक दुर्लभ रणनीतिक ‘ट्राइफेक्टा’ प्राप्त कर ली है—

  1. पूरी तरह देश में विकसित क्वाज़ी-बैलिस्टिक मिसाइल

  2. स्वदेशी गाइडेंस और सीकर प्रणाली

  3. स्वदेशी GIS-आधारित डिजिटल मिशन-प्लानिंग सिस्टम

यह उपलब्धि भारतीय रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भरता को मजबूत करती है और वैश्विक मंच पर भारत की क्षमता का स्पष्ट संदेश देती है।


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