बोलता सच,जालौन : जगनेवा गांव में बंधुआ मजदूरी के मामले का खुलासा होने के बाद सामने आई मजदूरों की आपबीती ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस द्वारा मुक्त कराए गए चार मजदूरों ने बताया कि उनकी जिंदगी किसी कैदखाने से कम नहीं थी। उन्हें भूख, मारपीट और अमानवीय यातनाओं के बीच जबरन मजदूरी करने के लिए मजबूर किया जाता था।
मजदूरों के अनुसार उनसे सुबह से देर रात तक लगातार काम कराया जाता था। गोबर उठाने से लेकर पशुओं को चारा डालना, खेतों में मजदूरी और घर के अन्य काम तक उनसे करवाए जाते थे। काम में थोड़ी सी कमी होने पर बेरहमी से पिटाई की जाती थी।
बासी रोटी और थोड़ी दाल के सहारे गुजर रही थी जिंदगी
मुक्त कराए गए मजदूरों ने बताया कि उन्हें भरपेट खाना तक नहीं दिया जाता था। घर में बची हुई बासी रोटियां खाने के लिए दी जाती थीं। चार लोगों में मुश्किल से सौ ग्राम दाल बांटी जाती थी, ताकि वे किसी तरह जिंदा रह सकें। कई बार सिर्फ चटनी या भर्ता के साथ पूरा दिन गुजारना पड़ता था।
भोले-भाले लोगों को बनाते थे निशाना
ग्रामीणों के मुताबिक आरोपी रास्ता भटके या कमजोर लोगों को निशाना बनाते थे। पहले उनसे सहानुभूति दिखाकर बातचीत करते, फिर उन्हें गंतव्य तक छोड़ने का भरोसा देकर गांव ले आते थे। इसके बाद उन्हें बंधक बनाकर जबरन मजदूरी कराई जाती थी।
भागने की कोशिश करने या विरोध करने पर मजदूरों को इतनी प्रताड़ना दी जाती थी कि वे पूरी तरह डर के साए में जीने लगते थे।
दो साल तक कैद में रहे मजदूर
मुक्त कराए गए मजदूरों में दिल्ली विजय नगर निवासी अनिल, बरेली निवासी वीरेंद्र और हमीरपुर के कछुआ कला निवासी प्रेमचंद्र ने बताया कि वे करीब दो साल से आरोपियों के कब्जे में थे। वहीं राठ क्षेत्र के बेगए गांव निवासी धर्मेंद्र ने बताया कि उसे 17 दिन पहले रास्ते से बहला-फुसलाकर गांव लाया गया और बंधक बना लिया गया।
मजदूरों ने बताया कि उन्हें किसी से बात करने की भी अनुमति नहीं थी। उनका काम सिर्फ आदेश मानना और मजदूरी करना था।
महीनों तक एक ही कपड़े पहनने को मजबूर
पीड़ितों ने बताया कि उन्हें सिर्फ एक जोड़ी कपड़े दिए जाते थे, जिन्हें महीनों तक पहनना पड़ता था। कपड़े फटने पर पुराने और इस्तेमाल किए हुए कपड़े थमा दिए जाते थे। सर्दियों में नहाने तक की अनुमति नहीं थी और गर्मियों में भी वे गंदे कपड़ों में रहने को मजबूर थे।
रात में टिनशेड के कमरे में किया जाता था बंद
दिनभर मजदूरी कराने के बाद रात में सभी मजदूरों को टिनशेड वाले छोटे कमरे में बंद कर दिया जाता था। कमरे में न हवा की व्यवस्था थी और न ही रहने लायक माहौल। घुटन और गर्मी के बीच मजदूर पूरी रात वहीं बिताने को मजबूर थे।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते पुलिस कार्रवाई नहीं करती तो शायद ये मजदूर जिंदगीभर इसी कैद में फंसे रहते।
आसपास के गांवों में भी बंधुआ मजदूरी की आशंका
इस घटना के बाद अब आसपास के गांवों में भी कई अन्य लोगों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। ग्रामीणों के मुताबिक पहले भी गांवों में कुछ डरे-सहमे लोग दिखाई देते थे, जो किसी से बात नहीं करते थे और खेतों या पशुबाड़ों में काम करते नजर आते थे।
लोगों का कहना है कि आरोपी बस स्टैंड और रास्तों पर अकेले घूम रहे मजदूरों, मानसिक रूप से कमजोर या घर से भटके लोगों को निशाना बनाते थे। पुलिस द्वारा चार मजदूरों को मुक्त कराने के बाद अब क्षेत्र में ऐसे अन्य संभावित मामलों की तलाश भी शुरू कर दी गई है।
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