सबसे चौंकाने वाला उदाहरण अयोध्या विधानसभा सीट का है। वर्ष 2022 में भाजपा ने यहां करीब 20 हजार वोटों से जीत हासिल की थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह अंतर घटकर लगभग 4,600 रह गया। अब SIR के बाद इस सीट पर करीब 20 प्रतिशत यानी 80 हजार से अधिक वोट कम हो गए हैं, जो राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
इसी तरह लखनऊ कैंट सीट, जहां उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने 2022 में 39 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी, वहां भी 1.24 लाख वोट घट गए हैं। यह कुल मतदाताओं का लगभग 33 प्रतिशत है, जो किसी भी पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा सकता है।
राज्यभर में कुल 16 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां एक लाख से अधिक वोट कम हुए हैं। इनमें से 15 सीटें भाजपा और उसके सहयोगियों के खाते में हैं, जबकि केवल एक सीट लखनऊ पश्चिम समाजवादी पार्टी के पास है, जहां 1.07 लाख वोट घटे हैं।
अगर व्यापक आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा और उसके सहयोगियों की सीटों पर वोटों में 18% से 34% तक की गिरावट देखी गई है, जबकि समाजवादी पार्टी की अधिकांश सीटों पर यह गिरावट 15% से कम रही है। 50 से 80 हजार वोट घटने वाले क्षेत्रों में भी भाजपा की 55 से अधिक सीटें शामिल हैं, जबकि सपा की ऐसी सीटें केवल 18 हैं।
विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि वोटों में सबसे ज्यादा गिरावट शहरी क्षेत्रों में हुई है। खासकर वेस्ट यूपी और एनसीआर से जुड़े इलाकों में इसका प्रभाव अधिक देखने को मिला है। इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता संख्या में अपेक्षाकृत कम कमी दर्ज की गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव का सीधा असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक फायदा या नुकसान किसे होगा, यह चुनावी नतीजों के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। फिलहाल, SIR के बाद बदले आंकड़ों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को और अधिक दिलचस्प बना दिया है।