बोलता सच,अध्यात्म : ज्योतिष और धर्मशास्त्रों में यह माना गया है कि मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है। व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसे सुख और दुख का अनुभव होता है। यह कर्मफल कभी तुरंत तो कभी समय के साथ जीवन में विभिन्न रूपों में सामने आता है। जिस प्रकार विज्ञान कहता है कि पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, बल्कि केवल उसका रूप बदलता है, उसी प्रकार किए गए कर्म भी कभी व्यर्थ नहीं जाते।
प्राचीन ग्रंथों में ग्रहों की शांति और जीवन की समस्याओं से मुक्ति के लिए पूजा, यज्ञ, मंत्र-जाप, दान और रत्न धारण जैसे उपाय बताए गए हैं। लेकिन ऋषि-मुनियों ने केवल बाहरी उपायों पर ही नहीं, बल्कि व्यवहार और संबंधों की शुद्धता पर भी विशेष जोर दिया है। मान्यता है कि यदि व्यक्ति ग्रहों के प्रतिनिधि माने जाने वाले जीवों और संबंधों का सम्मान करे, तो ग्रह शीघ्र प्रसन्न हो सकते हैं।
धर्मशास्त्रों में “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, गुरु देवो भव, अतिथि देवो भव” जैसे सूत्र इसी ओर संकेत करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, नित्य वृद्धों का सम्मान, माता-पिता की सेवा, गुरुजनों का आदर और सदाचार का पालन करने से आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि होती है।
ज्योतिष शास्त्र में नौ ग्रहों को केवल आकाशीय पिंड नहीं माना गया, बल्कि उन्हें जीवन के विभिन्न संबंधों, स्वभावों और परिस्थितियों का प्रतीक भी बताया गया है। हर ग्रह किसी न किसी रिश्ते और गुण का प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति के जीवन में ग्रहों का प्रभाव उसके व्यवहार, सोच, संबंधों और जीवन की प्रमुख घटनाओं में दिखाई देता है।
सूर्य को आत्मा और पिता का कारक माना गया है। चंद्रमा मन और माता का प्रतिनिधित्व करता है। मंगल छोटे भाई-बहनों और पराक्रम से जुड़ा माना जाता है। बुध वाणी और मामा का कारक है। बृहस्पति ज्ञान, गुरु और बड़े भाई का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र जीवनसाथी और ऐश्वर्य से संबंधित माना जाता है, जबकि शनि सेवा, श्रमिक वर्ग और दुख का प्रतिनिधित्व करता है।
इसी आधार पर ज्योतिष में यह माना जाता है कि यदि कोई ग्रह अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो उससे जुड़े रिश्तों को मजबूत और सम्मानित करना लाभकारी हो सकता है। जैसे यदि सूर्य कमजोर हो तो पिता का सम्मान और सेवा करनी चाहिए। चंद्रमा पीड़ादायक हो तो माता और मातृवत स्त्रियों का आदर करना चाहिए। मंगल के कष्ट देने पर छोटे भाई-बहनों के साथ संबंध अच्छे रखने चाहिए। बुध अशुभ हो तो मामा और संबंधियों का सम्मान लाभकारी माना जाता है।
इसी प्रकार बृहस्पति को प्रसन्न करने के लिए गुरुजनों और बुजुर्गों का आदर करना चाहिए। शुक्र के लिए जीवनसाथी का सम्मान और सुख का ध्यान रखना जरूरी माना गया है। यदि शनि कष्ट दे रहा हो तो गरीब, श्रमिक और सेवकों के प्रति दया और सहयोग का भाव रखना शुभ माना गया है। राहु और केतु के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए जरूरतमंदों, रोगियों और दिव्यांगों की सहायता को विशेष महत्व दिया गया है।
ज्योतिष के जानकारों का मानना है कि केवल पूजा-पाठ या दान ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि व्यवहार की शुद्धता भी आवश्यक है। यदि व्यक्ति ग्रहों के प्रतिनिधि माने जाने वाले लोगों के साथ गलत व्यवहार करता है, तो कई बार पूजा, जप और दान का पूरा फल नहीं मिल पाता।
इसलिए भारतीय परंपरा में प्रेम, सम्मान, सेवा और सदाचार को सबसे बड़ा उपाय माना गया है। माना जाता है कि जब व्यक्ति अपने व्यवहार को सुधारता है और दूसरों के प्रति करुणा व आदर का भाव रखता है, तभी ग्रहों की वास्तविक कृपा प्राप्त होती है।
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