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“हम गरीब आदमी बानी, बाबू के पेट के रास्ता नईखे:कुशीनगर में बेटे के इलाज के लिए भटक रही मां, परिवार के पास पैसे नहीं

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बोलता सच कुशीनगर : कुशीनगर के खड्डा तहसील से एक दिल छू लेने वाली खबर सामने आई है। जहां एक मां अपने नवजात की ज़िंदगी बचाने के लिए गाँव-गाँव मदद की गुहार लगा रही है। ये कहानी है 24 वर्षीय सीमा की, जो अपने गोद में मासूम बेटे को लेकर सिस्टम, हालात और गरीबी से जंग लड़ रही है। सीमा के दो बेटियां हैं—4 साल की अंशिका और डेढ़ साल की आरोही। तीसरी संतान के रूप में दो महीने पहले बेटा करन पैदा हुआ, लेकिन जन्म के अगले ही दिन परिवार की खुशी मायूसी में बदल गई। पता चला कि करन का पेट जन्म से ही बंद है। न मलद्वार है, न रास्ता। डॉक्टरों की भाषा में कहें तो “कांग्रेसनिटल एनल एट्रेशिया”

“बेटा तो मिला… लेकिन पेट से रास्ता नहीं”

सीमा कहती है—“हम गरीब आदमी बानी, बाबू के पेट के रास्ता नईखे। पहिले ऑपरेशन करइलीं, अब 6 महीना बाद दोबारा होई। बकाया पैसा बा। बाबू के बचावे खातिर भीख मांगब, चंदा जुटाईब।”

पति गोविंद मजदूरी के सिलसिले में राजस्थान में हैं। मां सीमा अकेली थीं जब बच्चे की तबीयत बिगड़ी। गांव में न डॉक्टर, न साधन। झोलाछाप डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में पड़ोसन गायत्री ने इंसानियत की मिसाल पेश की। मां-बेटे को लेकर 30 किलोमीटर दूर जंगलों के रास्ते खड्डा CHC पहुंचीं। वहां से रेफर किया गया गोरखपुर।

इलाज के लिए किराए में ही उड़ गए पैसे

भाड़े की गाड़ी का 5000 किराया चुका कर माँ और गायत्री देवी किसी तरह गोरखपुर पहुंचीं। सरकारी अस्पताल की जगह प्राइवेट में भर्ती कराया गया। रिश्तेदारों और गाँव के लोगों ने मिलकर 40 हजार रुपये की दवाइयों का इंतजाम किया। एक गाँव का लड़का कमरे से खाना लाकर देता था ताकि बच्चा और मां भूखे न रहें।

डॉक्टरों ने फिलहाल पेट में बाईपास से नली डाल दी है ताकि बच्चे का मल बाहर आ सके। लेकिन यह सिर्फ एक अस्थायी समाधान है। 6 महीने बाद दूसरा बड़ा ऑपरेशन होना है, तभी करन की जान बच सकेगी। अस्पताल का 65 हजार का बकाया अब भी बाकी है।

विधायक बोले—”अब पता चला, हर संभव मदद करेंगे”

इस पूरे मामले पर जब दैनिक भास्कर ने खड्डा विधायक विवेकानंद पांडेय से बात की, तो उन्होंने कहा—“मुझे अब जानकारी मिली है, मैं तत्काल मामले को देखता हूं और परिवार की हर संभव मदद करूँगा। सरकार गरीबों के इलाज को लेकर संजीदा है।”

अब गांव में घर-घर चंदा मांग रही मां

सीमा अब गाँव वालों से चंदा इकट्ठा कर रही हैं। उसकी आंखों में उम्मीद की एक किरण अब भी बाकी है। कहती हैं—“करन के जान बच जाए बस, बाकी जिनगी त भाग्य पर बा…”


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