बोलता सच,लखनऊ। अलीगंज स्थित एक कॉमर्शियल बिल्डिंग में लगी भीषण आग ने 15 परिवारों की खुशियां छीन लीं। इस दर्दनाक हादसे में जान गंवाने वाले अधिकांश युवा अपने परिवारों के सपनों का सहारा थे। किसी का बेटा, किसी की बेटी, किसी का भाई और किसी का जीवनसाथी इस आग की भेंट चढ़ गया। हादसे के बाद किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के मुर्दाघर के बाहर ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं।
सोमवार रात करीब सात घंटे तक मृतकों के शवों का पोस्टमार्टम चलता रहा। इस दौरान मुर्दाघर के बाहर परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। कोई बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ रहा था तो कोई अपने प्रियजन की एक झलक पाने के लिए बिलख रहा था। वहां मौजूद हर चेहरा दर्द और बेबसी की कहानी बयां कर रहा था।
हादसे में जान गंवाने वाले युवकों में नीलेश कुमार भी शामिल थे। बेटे का शव देखते ही उनके पिता खुद को संभाल नहीं सके और बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाना पड़ा। यह दृश्य देखकर नीलेश की बहन फूट-फूटकर रोने लगी। वह बार-बार कह रही थी, “भैया चला गया… पापा उठो…” उसकी चीखों ने वहां मौजूद लोगों को भी भावुक कर दिया।
24 वर्षीय सुखमनी सिंह की मौत ने भी परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। उनके पिता प्रभजोत सिंह ने बताया कि आग लगने के दौरान बेटे का आखिरी फोन आया था। फोन पर वह घबराई आवाज में बार-बार कह रहा था, “पापा, आग लग गई है, बचा लो।” पिता ने नम आंखों से बताया कि यही उनके बेटे के आखिरी शब्द थे। सुबह मुस्कुराते हुए घर से निकला बेटा कुछ घंटों बाद हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गया।
22 वर्षीय अब्दुल रहमान अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था। उसके पिता लंबे समय से लकवाग्रस्त हैं और परिवार की पूरी जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। उसके दोस्त शादान ने बताया कि अब्दुल ने हादसे के दौरान घर फोन कर बताया था कि वह बिल्डिंग के अंदर फंस गया है। कुछ ही मिनटों में सब कुछ खत्म हो गया। अब उसकी मां को यकीन ही नहीं हो रहा कि उनका बेटा अब कभी वापस नहीं आएगा।
सीतापुर निवासी आदित्य श्रीवास्तव भी इस हादसे का शिकार बने। उनकी बहन निशा श्रीवास्तव आज भी उस मिस्ड कॉल को याद कर रही हैं, जिसका जवाब वह नहीं दे सकीं। उन्होंने बताया कि हादसे के दौरान आदित्य ने उन्हें फोन किया था, लेकिन वह कॉल रिसीव नहीं कर पाईं। बाद में पता चला कि धुएं से बचने के लिए आदित्य और अन्य लोग बाथरूम में बंद हो गए थे। आदित्य के चचेरे भाई भुवन श्रीवास्तव ने खिड़की से कूदकर अपनी जान बचा ली थी। उन्होंने आदित्य को भी कूदने के लिए कहा, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया।
हादसे में जान गंवाने वालों में लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी, सीतापुर, कोलकाता, मध्य प्रदेश और हरियाणा के युवा शामिल हैं। सभी अपने करियर को संवारने और बेहतर भविष्य बनाने के लिए मेहनत कर रहे थे, लेकिन एक भयावह हादसे ने उनके सपनों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
मृतकों में अनुच्छा राय (24), अनामिका सामंत (30), सौमाल्य बेरा (24), सागर पंत (28), सुखमनी सिंह (24), ज्योति (26), आदित्य श्रीवास्तव (24), जयनील चक्रवर्ती (26), अब्दुल रहमान (22), संयम विज (28), मोहम्मद अम्मार (24), नीलेश कुमार (27), सूरज सिंह (27), शाहजान सिद्दीकी (18) और भविष्य (23) शामिल हैं।
मोहम्मद अम्मार के परिजनों ने बताया कि उसने भी आग लगने के बाद घर फोन कर बताया था कि सभी लोग अंदर फंसे हुए हैं और बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। इसके बाद संपर्क टूट गया।
मंगलवार सुबह पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिए गए। कोलकाता और मध्य प्रदेश से आए परिवार अपने बच्चों के शव लेकर लौट गए। अपनों के अंतिम दर्शन के दौरान कई परिजन बेहोश हो गए। एम्बुलेंसों के साथ लौटते परिवारों के पास अब केवल अपने बच्चों की यादें, अधूरे सपने और इस दर्दनाक हादसे की डरावनी स्मृतियां ही बची हैं। यह अग्निकांड न केवल 15 जिंदगियां ले गया, बल्कि दर्जनों परिवारों को ऐसा जख्म दे गया, जो शायद कभी नहीं भर पाएगा।
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