Breaking News

जस्टिस उज्जल भुइयां बोले- लोकतंत्र में असहमति के लिए जगह सिमट रही, विरोध करने वालों पर बढ़ रही सख्ती

Bolta Sach News
|
Justice Ujjal Bhuiyan said

बोलता सच,नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा है कि भारत में असहमति और विरोध की अभिव्यक्ति के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने चिंता जताई कि विरोध दर्ज कराने वाले छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कई मामलों में गिरफ्तारी, लंबी कानूनी प्रक्रिया और जमानत मिलने में देरी जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

जस्टिस भुइयां ने यह बातें नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में आयोजित जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर के चौथे संस्करण को संबोधित करते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से कई बार सामान्य नागरिक गतिविधियों को भी अपराध की तरह देखा जाने लगा है।

गंगा में इफ्तार के दौरान गिरफ्तारी का किया उल्लेख

अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने अधिकारियों की कथित सख्त कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए गंगा नदी में नाव पर इफ्तार करने वाले युवाओं की गिरफ्तारी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि किसी कानून में गंगा में चिकन खाने पर रोक नहीं है, तो केवल इस आधार पर लोगों को गिरफ्तार करना और महीनों तक जमानत न देना गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं और छात्रों की स्थिति पर चिंता

जस्टिस भुइयां ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं का भी जिक्र करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण की मांग उठाने वाले कई लोगों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में छात्रों को परिसर से गिरफ्तार किया जाता है और उन्हें जमानत मिलने से पहले 30 से 40 दिन तक जेल में रहना पड़ता है। इस दौरान उन्हें शिक्षण संस्थानों से निलंबन और लंबी कानूनी लड़ाई का भी सामना करना पड़ता है।

जमानत की शर्तों पर उठाए सवाल

उन्होंने जमानत की कुछ सख्त शर्तों पर भी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, कई मामलों में आरोपियों के फरार होने की आशंका न होने के बावजूद उनसे पासपोर्ट जमा कराने या सोशल मीडिया पर पोस्ट न करने जैसी शर्तें लगाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें लोगों में आत्म-सेंसरशिप की भावना पैदा कर सकती हैं।

‘फेसबुक टिप्पणी पर भी दर्ज हो रही एफआईआर’

जस्टिस भुइयां ने कहा कि कई बार किसी मंत्री के कामकाज पर फेसबुक पर टिप्पणी करने जैसी घटनाओं में भी एफआईआर दर्ज कर ली जाती है, जिसके बाद संबंधित व्यक्ति को अग्रिम जमानत के लिए अदालत का रुख करना पड़ता है।

उन्होंने दिल्ली दंगों से जुड़े गुलफिशा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी जमानत शर्तें, जो युवा कार्यकर्ताओं को ऑनलाइन या ऑफलाइन सार्वजनिक बैठकों में शामिल होने या उन्हें संबोधित करने से रोकती हैं, लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की भावना को कमजोर कर सकती हैं।


इसे भी पढ़े : फतेहपुर में बोले सीएम योगी- विकास ही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत, माफिया के लिए सिर्फ जेल या जहन्नुम का रास्ता


Discover more from Bolta Sach News - बोलता सच न्यूज़ - सच लिखने का साहस

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Join WhatsApp

Join Now

Leave a Reply

error: