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संसद में हंगामे पर हरिवंश की दो टूक, बोले- सदन में बार-बार व्यवधान लोकतंत्र की साख पर प्रहार

Bolta Sach News
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Harivansh's statement on the ruckus in Parliament

बोलता सच,नई दिल्ली : राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के लगातार हंगामे और नारेबाजी पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि संसद की कार्यवाही में बार-बार बाधा डालना संसदीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करता है। उन्होंने यह बात किसी एक दल या व्यक्ति के संदर्भ में नहीं, बल्कि एक चिंतित नागरिक के तौर पर कही।

ANI को दिए एक इंटरव्यू में हरिवंश ने कहा कि आज संसद में संविधान का बार-बार उल्लेख किया जाता है और कई लोग संविधान की प्रतियां लेकर प्रदर्शन करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि संविधान के प्रति हमारा आचरण कैसा है। उन्होंने कहा कि संविधान पर चर्चा के दौरान करीब 2,400 संशोधन प्रस्तावित किए गए थे, ऐसे में संसद को गंभीर चर्चा और विमर्श का मंच बनाए रखना जरूरी है।

संसद को लोकतंत्र का मंदिर बताया

हरिवंश ने कहा कि संसद उनके लिए लोकतंत्र के मंदिर की तरह है। सरकारें और सत्ता में बैठे लोग बदलते रहते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाएं स्थायी होती हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में देश के सभी राजनीतिक दलों को मिलकर काम करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि भारत के सामने मौजूद चुनौतियों के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की समान जिम्मेदारी है। यदि किसी एक पक्ष ने तय कर लिया कि सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी जाएगी, तो संसद में वही स्थिति पैदा होती है जो हाल के सत्र में देखने को मिली।

संसदीय लोकतंत्र की साख पर चिंता

हरिवंश ने कहा कि संसद में कामकाज के आंकड़े अपनी जगह हैं, लेकिन लगातार व्यवधान से संसदीय लोकतंत्र के प्रति लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। उन्होंने चिंता जताई कि यदि महत्वपूर्ण फैसले संसद में चर्चा के बजाय सड़कों पर होने लगें, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर स्थिति होगी।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 1958 के एक संदेश का भी उल्लेख किया। हरिवंश के मुताबिक, नेहरू का मानना था कि संसद की गरिमा और अनुशासन देश के दूसरे हिस्सों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और करोड़ों लोगों की निगाहें संसद की ओर रहती हैं।

सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी

राज्यसभा के उपसभापति ने स्पष्ट किया कि संसद को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि विपक्ष की भी है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध जरूरी हैं, लेकिन इसके लिए सदन की कार्यवाही को लगातार बाधित करना उचित तरीका नहीं हो सकता।

हरिवंश ने कहा कि वह यह टिप्पणी उपसभापति के पद की औपचारिक भूमिका से नहीं, बल्कि एक चिंतित नागरिक के रूप में कर रहे हैं। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन, जेपी आंदोलन से जुड़े अनुभव और करीब 12 वर्षों के संसदीय अनुभव का भी जिक्र किया।

पेपर लीक और छात्रों के आंदोलन पर भी बोले

पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी के मुद्दे पर हरिवंश ने कहा कि यह समस्या नई नहीं है। उनके अनुसार कई दशकों से विभिन्न राज्यों में परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी अनियमितताओं के मामले सामने आते रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब व्यवस्था की कमियां पहले से दिखाई दे रही थीं, तो उन्हें दूर करने के लिए व्यापक स्तर पर सुधार पहले क्यों नहीं किए गए।

उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित न रहें, बल्कि शासन और सिस्टम में सुधार की जरूरत पर भी विचार करें। हरिवंश ने कहा कि छात्रों के आंदोलनों के पीछे मौजूद पीड़ा को समझना जरूरी है और सरकार की ओर से उनकी मांगों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई गई है।

हरिवंश का संदेश साफ रहा कि लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। राजनीतिक मतभेदों और विरोध के बावजूद संसद को चर्चा, बहस और जनहित के फैसलों का प्रभावी मंच बनाए रखना जरूरी है।


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