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कर्नाटक कांग्रेस में फिर तेज हुई सत्ता संघर्ष की चर्चा, सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार आमने-सामने

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Karnataka Congress intensifies again
बोलता सच,नई दिल्ली : कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर चर्चा में आ गई है। सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब पार्टी के भीतर खुलकर दिखाई देने लगी है। माना जा रहा है कि केरल में सरकार गठन की प्रक्रिया शांत होने के बाद कांग्रेस आलाकमान का फोकस अब पूरी तरह कर्नाटक की स्थिति पर लौट आया है।
पिछले वर्ष नवंबर में भी नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों ने राज्य कांग्रेस में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर दी थी। हालांकि उस समय पार्टी नेतृत्व ने किसी ठोस फैसले के बजाय मामले को टालकर स्थिति संभाल ली थी। अब एक बार फिर मुख्यमंत्री पद को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सूत्रों के अनुसार, सिद्धारमैया कैबिनेट विस्तार और फेरबदल के जरिए अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। वह खाली पड़े मंत्री पदों को भरने और नए विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करने के पक्ष में हैं। माना जा रहा है कि अगर कैबिनेट विस्तार होता है, तो इससे विधायक दल और सरकार पर उनकी पकड़ और मजबूत हो सकती है।
दूसरी ओर, डीके शिवकुमार अब भी मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को बनाए हुए हैं। उनके समर्थक लगातार कांग्रेस आलाकमान को कथित सत्ता-साझाकरण समझौते की याद दिला रहे हैं। पार्टी के भीतर यह चर्चा भी है कि यदि नेतृत्व परिवर्तन में और देरी हुई, तो शिवकुमार खेमे की नाराजगी बढ़ सकती है।
कांग्रेस के कई विधायक भी इस समय सक्रिय लॉबिंग में जुटे हैं। माना जा रहा है कि संभावित कैबिनेट विस्तार या फेरबदल की स्थिति में कई विधायक मंत्री पद की उम्मीद लगाए हुए हैं। इसी वजह से पार्टी के भीतर दबाव की राजनीति भी तेज हो गई है।
हाल के दिनों में डीके शिवकुमार के समर्थन में लगाए गए पोस्टरों ने भी राजनीतिक अटकलों को और हवा दी है। कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय और राज्य के कई हिस्सों में लगे पोस्टरों में उन्हें “कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री” बताया गया। मैसूर में उनके समर्थकों ने जन्मदिन के अवसर पर ऐसा केक भी काटा, जिसमें उन्हें अगले मुख्यमंत्री के रूप में दर्शाया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल कांग्रेस आलाकमान “इंतजार करो और देखो” की रणनीति पर काम कर रहा है। पार्टी नेतृत्व किसी जल्दबाजी वाले फैसले से बचना चाहता है, क्योंकि किसी भी निर्णय से एक खेमे की नाराजगी तय मानी जा रही है।
सूत्रों का कहना है कि यदि आलाकमान सिद्धारमैया को जारी रखता है, तो शिवकुमार समर्थक असंतुष्ट हो सकते हैं। वहीं अगर सत्ता परिवर्तन होता है, तो सिद्धारमैया खेमे में विरोध की स्थिति बन सकती है।
फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व की नजर राज्य की राजनीतिक स्थिरता, ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों पर भी बनी हुई है। ऐसे में पार्टी कोई भी फैसला बेहद सावधानी से लेने के मूड में दिखाई दे रही है।

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