जमीन पर दिखने लगा असर
सरकारी निर्देश का असर कंपनियों की रणनीति और ब्रांडिंग में साफ नजर आने लगा है। सूत्रों के अनुसार, ब्लिंकिट ने अपनी ब्रांडिंग से ‘10 मिनट’ का दावा हटा दिया है। कंपनी ने अपनी टैगलाइन बदलकर अब
“30,000 से अधिक उत्पाद आपके दरवाजे पर वितरित”
कर दी है, जो पहले
“10 मिनट में 10,000 से अधिक उत्पाद”
थी।
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण डिलीवरी पार्टनर्स पर पड़ने वाला मानसिक और शारीरिक दबाव बताया जा रहा है। सार्वजनिक बहस में यह मुद्दा लंबे समय से उठ रहा था कि खराब मौसम, ट्रैफिक और टाइमर के दबाव में गिग वर्कर्स को जोखिम भरे हालातों में काम करना पड़ता है।
संसद में भी उठा था गिग वर्कर्स का मुद्दा
क्विक कॉमर्स कंपनियों की कार्यप्रणाली पर संसद में भी सवाल उठ चुके हैं। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने गिग वर्कर्स के लिए उचित वेतन, सम्मान और सुरक्षा की मांग करते हुए सख्त नियामक ढांचे की जरूरत बताई थी। उन्होंने कहा था कि ऐप-आधारित डिलीवरी कंपनियों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 से मिलेगा संरक्षण
सरकार ने गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के हितों की रक्षा के लिए पहले ही कानूनी ढांचा तैयार कर लिया है।
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सोशल सिक्योरिटी कोड 2020: 21 नवंबर 2025 से प्रभावी, जिसमें पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कानूनी पहचान दी गई।
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कल्याणकारी योजनाएं: जीवन व विकलांगता बीमा, दुर्घटना कवर, स्वास्थ्य व मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा।
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सोशल सिक्योरिटी फंड: कल्याणकारी योजनाओं के लिए अलग कोष और राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का प्रावधान।
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ई-श्रम पोर्टल: अगस्त 2021 से शुरू पोर्टल, असंगठित और प्लेटफॉर्म वर्कर्स का डेटाबेस तैयार कर लाभ पहुंचाने में मदद करेगा।
कंपनियों के लिए क्या संदेश?
इस फैसले से क्विक कॉमर्स कंपनियों को अपनी लॉजिस्टिक्स और एल्गोरिदम रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। अब तक जहां ‘स्पीड’ सबसे बड़ा हथियार थी, वहीं अब सुरक्षा और स्थिरता को प्राथमिकता देनी होगी। 10 मिनट की डिलीवरी रेस का अंत भारत की गिग इकोनॉमी के परिपक्व होने का संकेत माना जा रहा है।
राघव चड्ढा बोले- ‘सत्यमेव जयते, हम जीत गए’
AAP सांसद राघव चड्ढा ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे मानवीय गरिमा और सुरक्षा की जीत बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा,
“सत्यमेव जयते। हम साथ मिलकर जीत गए हैं।”
राघव चड्ढा लंबे समय से इस मुद्दे पर मुखर रहे हैं। उन्होंने सैकड़ों डिलीवरी पार्टनर्स से बातचीत की और उनकी परेशानियों को समझने के लिए खुद डिलीवरी एजेंट बनकर काम भी किया था। उनका तर्क था कि ‘10 मिनट’ का टाइमर डिलीवरी पार्टनर्स पर जानलेवा दबाव बनाता है और उन्हें ट्रैफिक नियम तोड़ने के लिए मजबूर करता है।