बोलता सच, इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपराध के समय नाबालिग था और उसका मामला किशोर न्याय अधिनियम के तहत निपटाया गया है, तो उसकी दोषसिद्धि भविष्य में सरकारी नौकरी पाने में बाधक नहीं हो सकती। साथ ही, नियुक्ति के दौरान यदि उसने अपने बाल अपराध का उल्लेख नहीं किया है तो यह सेवा से बर्खास्तगी का आधार नहीं बन सकता।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति शैलेन्द्र क्षितिज की खंडपीठ ने यह टिप्पणी देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) इलाहाबाद के आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही याची शिक्षक को सभी लाभों सहित सेवा में बहाल करने का आदेश दिया गया।
मामला अमेठी के गौरीगंज स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय का है, जहां 2019 में पीजीटी परीक्षा के बाद याची की नियुक्ति हुई थी। नियुक्ति के दो माह बाद उस पर आपराधिक इतिहास छिपाने का आरोप लगाते हुए विभागीय जांच की गई और सेवा समाप्त कर दी गई।
याची ने कैट में याचिका दायर की, जहां उसकी अर्जी सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह केस के तहत स्वीकार की गई और विभाग को पुनः जांच का निर्देश दिया गया। इसके खिलाफ विभाग और याची दोनों हाईकोर्ट पहुंचे।
हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध 2011 में हुआ था, जब किशोर न्याय अधिनियम, 2000 लागू था। इसलिए किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की वह धारा, जो 16 वर्ष से अधिक आयु वाले बाल अपराधियों को अपवाद बनाती है, इस मामले में लागू नहीं होगी।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी:
किशोर न्याय अधिनियम, 2000 की धारा 19(1) के अनुसार, यदि अपराध के समय व्यक्ति किशोर था और उसका मामला अधिनियम के तहत निपटाया गया है, तो उसकी सजा भविष्य में किसी भी कानून के तहत बाधक नहीं मानी जाएगी।
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