बोलता सच,टेक्नोलोजी : अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक अनोखी और बेहद छोटी मशीन विकसित की है, जो पारंपरिक तरीकों से अलग पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड और उसकी घूर्णन गति से सीधे बिजली पैदा करती है। यह प्रयोग न्यू जर्सी में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की अगुवाई में किया गया, जिसमें नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) के वैज्ञानिक भी शामिल रहे। हालांकि इस मशीन से अभी केवल कुछ माइक्रोवोल्ट बिजली ही उत्पन्न हो पाई है, लेकिन यह प्रयोग भविष्य में लगातार और मुफ्त ऊर्जा के नए रास्ते खोलने की संभावना दिखाता है।
कैसे बनती है बिजली
‘फिजिकल रिव्यू रिसर्च’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, इस शोध का नेतृत्व प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रिस्टोफर एफ. चिबा ने किया। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी के भीतर पिघली हुई धातुओं की हलचल से एक विशाल मैग्नेटिक फील्ड बनता है, जो पूरे ग्रह को घेरे रहता है। जब पृथ्वी घूमती है, तो यह मैग्नेटिक फील्ड अंतरिक्ष में लगभग स्थिर रहता है। इस वजह से पृथ्वी की सतह पर मौजूद हर वस्तु लगातार इस मैग्नेटिक फील्ड को काटती रहती है।
सिद्धांत रूप में इससे बिजली पैदा हो सकती है, लेकिन आमतौर पर इलेक्ट्रॉन जल्दी संतुलन बना लेते हैं और करंट खत्म हो जाता है। वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान निकालते हुए एक ऐसी विशेष सामग्री का इस्तेमाल किया, जो मैग्नेटिक फील्ड को मोड़ती है और इलेक्ट्रॉनों के संतुलन बनने की प्रक्रिया को बाधित करती है। इसी वजह से लगातार बेहद कम मात्रा में ही सही, लेकिन बिजली उत्पन्न होती रहती है।
कैसे किया गया प्रयोग
इस सिद्धांत की जांच के लिए वैज्ञानिकों ने पहले एक अंडरग्राउंड कमरे में प्रयोग किया, जहां बाहरी इलेक्ट्रिक शोर बेहद कम था। वोल्टेज बहुत ही कम था, लेकिन परिणाम स्पष्ट थे। इसके बाद सामान्य वातावरण में भी प्रयोग दोहराया गया, जहां शोर ज्यादा था, फिर भी नतीजे लगभग समान रहे। करंट मोड में भी बहुत कम करंट मापा गया, जो रोजमर्रा के उपकरणों को चलाने के लिए लाखों गुना कम है।
भविष्य की संभावनाएं
हालांकि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इसे बड़े स्तर पर विकसित किया गया, तो इससे दूर-दराज के इलाकों में लगे सेंसर, वैज्ञानिक उपकरण और छोटे डिवाइस बिना बैटरी के चलाए जा सकते हैं। कई छोटी इकाइयों या सिलेंडरों को जोड़कर वोल्टेज बढ़ाने की संभावना भी जताई जा रही है।
वैज्ञानिकों में बहस
इस खोज को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में बहस भी जारी है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिद्धांत मौजूदा भौतिकी के नियमों से मेल नहीं खाता। प्रोफेसर चिबा का कहना है कि सबसे जरूरी है कि अन्य शोध दल इस प्रयोग को दोहराएं और इसकी पुष्टि करें या इसे खारिज करें। अगर यह प्रयोग सही साबित हुआ, तो यह साफ, सुरक्षित और हमेशा उपलब्ध ऊर्जा का एक बिल्कुल नया स्रोत बन सकता है।
यह खोज भले ही अभी प्रयोगशाला तक सीमित हो, लेकिन आने वाले समय में यह ऊर्जा उत्पादन की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।
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