बोलता सच देवरिया : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई नाबालिग लड़की अपनी इच्छा से घर छोड़ती है और उसे अपने निर्णय तथा कृत्यों की जानकारी है, तो इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 363 के तहत अपहरण नहीं कहा जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी नाबालिग को बहला-फुसलाकर या ज़बरदस्ती साथ ले जाने और नाबालिग द्वारा स्वेच्छा से किसी के साथ जाने में मूलभूत अंतर है।
यह फैसला न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने सुनाया। यह आदेश देवरिया जिले के गौरीबाजार थाने से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ता हिमांशु दुबे की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले की शुरुआत तब हुई जब देवरिया जिले में दर्ज एक प्राथमिकी (एफआईआर) में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि हिमांशु दुबे ने उसकी लगभग 16 वर्षीय भतीजी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। शिकायत में इसे सीधा-सीधा अपहरण की घटना बताया गया था और इसी आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 363 के तहत मामला दर्ज कर लिया। हालांकि, जब यह मामला अदालत में पहुँचा तो कई नए तथ्य सामने आए।
पीड़िता का बयान और परिस्थितियाँ
पीड़िता ने अदालत के सामने दिए अपने बयान में कहा कि उसने स्वयं अपनी इच्छा से घर छोड़ा था। उसने यह भी बताया कि उसके परिवार के लोग उसे मारते-पीटते थे और यहां तक कि उसे बिजली का झटका भी दिया गया। इन परिस्थितियों से परेशान होकर उसने घर छोड़ने का निर्णय लिया।
उसने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता हिमांशु दुबे ने न तो उसका अपहरण किया और न ही बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। थाने ले जाने से पहले वह दो दिनों तक बिहार के सिवान जिले में रही थी और इस दौरान भी उसने किसी दबाव या ज़बरदस्ती का आरोप नहीं लगाया।
अभियोजन पक्ष की विफलता
मामले में अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूशन) यह साबित करने में असफल रहा कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में लड़की का अपहरण किया था। अदालत ने देखा कि पीड़िता के बयानों और घटनाक्रम में यह कहीं नहीं सिद्ध होता कि हिमांशु दुबे ने कोई अपराध किया। चूँकि कोई ठोस साक्ष्य या गवाह नहीं थे जो अपहरण का संकेत देते, इसलिए अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर हो गया।
कोर्ट की टिप्पणी और कानूनी व्याख्या
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह समझना आवश्यक है कि किसी नाबालिग को किसी व्यक्ति द्वारा जबरन ले जाने और नाबालिग द्वारा स्वेच्छा से जाने में अंतर है।
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यदि नाबालिग अपने संरक्षकों (गार्डियंस) को छोड़ने का निर्णय खुद लेता/लेती है, और उसमें किसी अन्य व्यक्ति की सक्रिय भूमिका साबित नहीं होती, तो इसे अपहरण नहीं कहा जा सकता।
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आईपीसी की धारा 363 का उद्देश्य उन परिस्थितियों को दंडित करना है जहाँ किसी नाबालिग को उसके संरक्षकों से अलग करके जबरन या छलपूर्वक ले जाया जाता है। लेकिन यदि नाबालिग स्वयं घर छोड़ दे, तो यह धारा लागू नहीं होती।
न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में अदालत को तथ्यों और परिस्थितियों का बारीकी से परीक्षण करना ज़रूरी है। केवल एफआईआर में लगाए गए आरोप पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि वास्तविक साक्ष्य और पीड़िता का बयान अधिक महत्व रखते हैं।
निर्णय का असर
इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून को लागू करते समय न्यायालय को केवल उम्र का ही नहीं बल्कि परिस्थितियों और स्वतंत्र इच्छा का भी ध्यान रखना चाहिए।
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इस फैसले से उन मामलों में राहत मिलेगी जहाँ परिवारिक विवादों या सामाजिक दबाव के चलते झूठे आरोप लग जाते हैं।
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अक्सर देखने को मिलता है कि यदि नाबालिग लड़की घर से चली जाए और उसके साथ कोई परिचित व्यक्ति हो, तो परिवारजन तुरंत अपहरण का मामला दर्ज करा देते हैं। लेकिन अदालत ने यह साफ़ कर दिया है कि केवल साथ होने से अपहरण नहीं माना जा सकता, जब तक कि ज़बरदस्ती, छल या बहकावे का ठोस प्रमाण न हो।
समाज और परिवार के लिए संदेश
इस मामले में पीड़िता ने खुद स्वीकार किया कि उसने घर छोड़ा क्योंकि उसे परिवार से प्रताड़ना मिल रही थी। अदालत का यह फैसला न केवल कानून की दृष्टि से अहम है बल्कि समाज और परिवारों के लिए भी एक संदेश है कि बच्चों के साथ व्यवहार करते समय संतुलन और संवेदनशीलता बनाए रखना आवश्यक है।
परिवारिक हिंसा या अनुशासन के नाम पर अत्यधिक कठोरता बच्चों को घर छोड़ने पर मजबूर कर सकती है। ऐसे मामलों में सीधे-सीधे अपहरण का आरोप लगाना न केवल निर्दोष व्यक्तियों के लिए अन्यायपूर्ण है बल्कि न्याय व्यवस्था पर भी अनावश्यक बोझ डालता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की उस सोच को दर्शाता है जिसमें केवल क़ानूनी प्रावधानों को नहीं, बल्कि मानवीय पहलुओं और वास्तविक परिस्थितियों को भी महत्व दिया जाता है।
मामले के तथ्यों, पीड़िता के बयान और साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए अदालत ने कहा कि जब कोई नाबालिग अपनी मर्जी से घर छोड़ देती है और किसी व्यक्ति की संलिप्तता सिद्ध नहीं होती, तो आईपीसी की धारा 363 के तहत अपहरण का मामला नहीं बनता।
यह फैसला आने वाले समय में ऐसे कई मामलों में मिसाल के तौर पर पेश किया जाएगा और न्यायालयों को यह याद दिलाएगा कि हर परिस्थिति में तथ्यों की गहराई से पड़ताल करना जरूरी है।
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