बोलता सच,नई दिल्ली। भारतीय सेना की आर्टिलरी ताकत जल्द ही कई गुना बढ़ने वाली है। आईआईटी मद्रास ने डिफेंस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल करते हुए रैमजेट आधारित आर्टिलरी शेल विकसित किए हैं, जिससे तोप के गोलों की रेंज में करीब 50 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है। खास बात यह है कि लंबी दूरी तय करने के बावजूद इन गोलों की मारक क्षमता में कोई कमी नहीं आई है।
परीक्षण में शानदार नतीजे
इस नई तकनीक को भारतीय सेना की विभिन्न तोपों पर परखा गया, जहां रेंज और स्पीड दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई—
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ATAGS: 40 किमी से बढ़कर 70 किमी
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K-9 वज्र: 36 किमी से बढ़कर 62 किमी
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धनुष आर्टिलरी गन: 30 किमी से बढ़कर 55 किमी
कैसे काम करती है रैमजेट तकनीक?
आईआईटी मद्रास द्वारा विकसित इस तकनीक में तोप के गोलों में रैमजेट इंजन लगाया गया है। गोला तोप से निकलने के बाद भी हवा से ऑक्सीजन लेकर आगे बढ़ता रहता है, जिससे उसकी रेंज काफी बढ़ जाती है।
सबसे अहम बात यह है कि इसके लिए नई तोप या नया हथियार सिस्टम लगाने की जरूरत नहीं है—मौजूदा तोपों के साथ ही इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
2020 में शुरू हुआ था प्रोजेक्ट
यह परियोजना वर्ष 2020 में भारतीय सेना के सहयोग से शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य ऐसा आर्टिलरी शेल विकसित करना था जो:
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फायरिंग के दौरान सुरक्षित रहे
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हवा में स्थिरता बनाए रखे
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रैमजेट इंजन प्रभावी ढंग से काम करे
यह तकनीक ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत विकसित की गई है, जो कम लागत में मौजूदा प्रणालियों को आधुनिक युद्ध के लिए और अधिक सक्षम बनाती है।
प्रोजेक्ट टीम
इस परियोजना का नेतृत्व आईआईटी मद्रास के प्रो. पी.ए. रामकृष्ण ने किया। टीम में सेना और अकादमिक जगत के कई दिग्गज शामिल रहे, जिनमें—
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लेफ्टिनेंट जनरल पी.आर. शंकर (सेवानिवृत्त)
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लेफ्टिनेंट जनरल हरि मोहन अय्यर (सेवानिवृत्त)
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प्रो. एच.एस.एन. मूर्ति, प्रो. जी. राजेश, प्रो. एम. रामकृष्ण, प्रो. मुरूगैयन
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प्रो. लाजर सी और डॉ. योगेश कुमार वेलारी
सेना की ताकत को नई धार
यह उपलब्धि दिखाती है कि कैसे पुरानी सैन्य प्रणालियों को उन्नत बनाकर कम खर्च में, स्वदेशी और अत्याधुनिक युद्ध क्षमताएं विकसित की जा सकती हैं। आने वाले समय में यह तकनीक भारतीय सेना की रणनीतिक बढ़त को और मजबूत करेगी।
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