एक पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या यह व्यापार समझौता किसी दबाव में किया गया है, तो उन्होंने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। डॉ. वोहरा ने कहा, “किस बात का दबाव? अगर भारत यह डील नहीं करता तो क्या कोई न्यूक्लियर बम फेंक दिया जाता?” उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि अगर यह कहा जा रहा है कि भारत ने सब कुछ दे दिया, तो क्या अमेरिका आकर नई दिल्ली में सरकार बैठा देगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे आरोप लगाना आसान है, लेकिन उनके पीछे कोई ठोस तर्क नहीं है।
डॉ. दीपक वोहरा ने कहा कि कूटनीति को समझे बिना उस पर टिप्पणी करना आजकल एक फैशन बन गया है। उनके मुताबिक, जो लोग कूटनीति की बारीकियों को नहीं समझते, वही सबसे ज्यादा आलोचना करते हैं। उन्होंने अफसोस जताया कि समझौते की शर्तें सार्वजनिक होने से पहले ही उसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया और आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में मतभेद और आलोचना स्वाभाविक हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों पर एकजुटता जरूरी होती है। इस संदर्भ में उन्होंने कई देशों का उदाहरण दिया, जहां संसद और राजनीतिक दल देश के बड़े मुद्दों पर एक साथ खड़े नजर आते हैं। डॉ. वोहरा का मानना है कि भारत को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने हितों के सवाल पर इसी तरह परिपक्व दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
इससे पहले एक अन्य इंटरव्यू में डॉ. दीपक वोहरा ने भारत की विदेश नीति को “डक डिप्लोमेसी” करार दिया था। उन्होंने समझाया कि जैसे पानी में तैरता हुआ बतख ऊपर से शांत दिखता है, लेकिन पानी के अंदर उसके पैर लगातार चलते रहते हैं, उसी तरह भारत शांत और संयमित दिखते हुए भी पर्दे के पीछे अपने हितों के लिए सक्रिय कूटनीति करता है।
डॉ. वोहरा ने जोर देकर कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों से कोई समझौता नहीं किया है। इसके बावजूद, भारत अपने प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक उद्देश्यों को काफी हद तक हासिल करने में सफल रहा है। उनके अनुसार, यह समझौता भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और आत्मविश्वासी विदेश नीति का स्पष्ट संकेत है।