ब्लूमबर्ग टेलीविजन को दिए एक इंटरव्यू में सुब्रमण्यन ने अमेरिका की संभावित टैरिफ नीति, चीन के बढ़ते निर्यात और सरकारी खजाने पर बढ़ते दबाव को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़े जोखिम बताया।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च में समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो लगातार दूसरे वर्ष दुनिया की सबसे तेज विकास दर मानी जा रही है। हालांकि, सुब्रमण्यन ने इस आंकड़े को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह अनुमान जीडीपी मापने की पुरानी समस्याओं से प्रभावित हो सकता है। खासतौर पर उन्होंने जीडीपी गणना में इस्तेमाल होने वाले डिफ्लेटर के असामान्य रूप से कम होने पर सवाल उठाए।
अर्थव्यवस्था की स्थिति स्पष्ट नहीं
सुब्रमण्यन ने कहा कि फिलहाल यह साफ नहीं है कि अर्थव्यवस्था वास्तव में पटरी पर लौट रही है या नहीं। उन्होंने कहा कि जो संकेतक मौजूदा आर्थिक हालात को दर्शाते हैं, वे धीमे पड़ते दिख रहे हैं। इसके साथ ही नाममात्र वृद्धि दर में भी गिरावट देखी जा रही है, जिससे विकास की दिशा और मजबूती दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने कहा, “मैं विकास दर का कोई सटीक अनुमान नहीं दे सकता, लेकिन अगर अगले साल भी विकास दर इस साल के आसपास रहती है, तो मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए।”
अमेरिका, चीन और राजकोषीय दबाव बड़ी चिंता
पूर्व CEA ने अमेरिका की व्यापार नीति को एक बड़ा जोखिम बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ अब भी चिंता का विषय बने हुए हैं। उनके अनुसार, अब किसी व्यापार समझौते की संभावना कम होती दिख रही है और टैरिफ दरें आगे और बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा, चीन के बढ़ते निर्यात और विकासशील देशों, खासकर भारत में सस्ते सामान की बाढ़ से घरेलू उद्योग पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, GST दरों में कटौती के चलते सरकारी खजाने पर बढ़ते दबाव को भी उन्होंने एक गंभीर चुनौती बताया।
आर्थिक सुधार के लिए उपाय भी सुझाए
सुब्रमण्यन ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मुद्रा नीति में अधिक लचीलेपन की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि निर्यातकों को बाहरी झटकों से बचाने के लिए रुपये की विनिमय दर को अधिक लचीला बनाया जाना चाहिए।
उनका मानना है कि जब सरकारी खजाने में संसाधन सीमित हों, तो रुपये का नियंत्रित अवमूल्यन एक प्रभावी उपाय हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपये को पूरी तरह लचीला बनाने में हिचकिचाहट दिखा रहा है और इस नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार की आवश्यकता है।
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