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इंडिगो संकट ने जगाई चिंता: एविएशन सेक्टर पर दो कंपनियों का दबदबा कितना खतरनाक?

Bolta Sach News
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Indigo crisis raises concerns

बोलता सच,नई दिल्ली: भारत का एविएशन सेक्टर इन दिनों भारी दबाव में नजर आ रहा है। इंडिगो में आए संकट और बड़ी संख्या में उड़ानों के रद्द होने से हजारों यात्री परेशान हुए हैं। इस घटना ने भारत में एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि जब किसी बाजार पर एक या दो कंपनियों का दबदबा हो जाता है, तो उसके क्या जोखिम होते हैं। यही स्थिति फिलहाल देश के एविएशन सेक्टर में दिख रही है, जहां इंडिगो और टाटा समूह की एयर इंडिया मिलकर घरेलू बाजार के 90% से ज्यादा हिस्से को नियंत्रित करते हैं। ऐसे में अगर इनमें से कोई एक भी कंपनी लड़खड़ाती है, तो पूरा सिस्टम प्रभावित होता है। यह परिदृश्य वैसा ही है जैसा कुछ साल पहले टेलीकॉम सेक्टर में दिखा था, जब सरकार के हस्तक्षेप ने वोडाफोन-आइडिया (Vi) को डूबने से बचाया था और बाजार सिर्फ जियो और एयरटेल के बीच सिमटने से बच गया था।


सरकार ने टेलीकॉम सेक्टर को मोनोपोली से कैसे बचाया?

2000 के दशक में टेलीकॉम इंडस्ट्री में कई कंपनियां थीं, लेकिन 2016 में जियो के सस्ते डेटा प्लान के आने के बाद प्रतिस्पर्धा तेज हो गई। वोडाफोन और आइडिया पहले से ही संघर्ष कर रहे थे और 2018 में विलय के बाद भी हालात नहीं सुधरे। नेटवर्क सुधार, स्पेक्ट्रम खरीद और कर्ज के बोझ ने कंपनी को कमजोर कर दिया। AGR मामले के बाद तो स्थिति और बिगड़ गई और Vi के बाजार से बाहर होने का खतरा बढ़ गया।

अगर Vi बंद हो जाती, तो भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में सिर्फ जियो और एयरटेल रह जाते। इस खतरे से बचने के लिए सरकार ने 2023 में Vi के AGR बकाए के 16,133 करोड़ रुपये को इक्विटी में बदल दिया, जिससे सरकार की कंपनी में 33% हिस्सेदारी हो गई। इससे कंपनी को राहत मिली और बाजार में तीन कंपनियों का संतुलन बना रहा। आज इसके सकारात्मक नतीजे भी दिख रहे हैं—कंपनी का ARPU, नेटवर्क निवेश और ग्राहक आधार धीरे-धीरे सुधर रहा है।


क्या सरकार एविएशन सेक्टर में भी दखल देगी?

टेलीकॉम से उलट, एविएशन सेक्टर की संरचना जटिल है। एयरलाइंस भारी फाइनेंसिंग, ईंधन लागत और वैश्विक उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती हैं। इसलिए सरकार का सीधा दखल आसान नहीं है।

2019 में जेट एयरवेज और 2023 में गो फर्स्ट के बंद होने के बाद बाजार लगभग दो खिलाड़ियों—इंडिगो और एयर इंडिया—के हाथों में आ गया। अन्य एयरलाइंस, जैसे स्पाइसजेट और अकासा, बेड़े की कमी और वित्तीय समस्याओं से जूझ रही हैं, इसलिए वे प्रतिस्पर्धा देने की स्थिति में नहीं हैं। नतीजतन, उड़ानों की संख्या, किराए और रूट स्ट्रक्चर पर दो बड़ी कंपनियों का प्रभाव बढ़ गया है।

सरकारी हस्तक्षेप की गुंजाइश कम है, लेकिन जोखिमों को कम करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।


सरकार क्या कर सकती है? प्रारंभिक संकेत क्या बताते हैं?

सरकार परामर्श और नियामक उपायों के जरिए संतुलन लाने की कोशिश कर रही है:

1. DGCA इंडिगो की उड़ानें घटा सकता है

इंडिगो पायलटों की भारी कमी से जूझ रहा है, जिससे दिसंबर में 5,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द हुईं। DGCA सर्दियों के शेड्यूल में इंडिगो को प्रतिदिन 300 उड़ानें घटाने के निर्देश दे सकता है। इससे अन्य छोटी एयरलाइनों को जगह मिलेगी।

2. अन्य एयरलाइंस को उड़ानें बढ़ाने के निर्देश

एयर इंडिया, स्पाइसजेट, अकासा जैसी कंपनियों से मांग बढ़ाने और इंडिगो की कमी को पूरा करने के लिए उड़ानें बढ़ाने को कहा गया है।

3. छोटे खिलाड़ियों को बढ़ावा

सरकार क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना (UDAN), तेज मंजूरी और विदेशी खिलाड़ियों के लिए सीमित बाजार प्रवेश जैसे कदमों पर विचार कर सकती है।

हालांकि, सरकार टेलीकॉम की तरह सीधा बेलआउट नहीं कर सकती। लेकिन वह ऐसे नियामक उपायों से बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने की कोशिश कर रही है, ताकि यात्रियों को मोनोपोली की मार न झेलनी पड़े।


भारत के एविएशन सेक्टर के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है—कैसे प्रतिस्पर्धा को जीवित रखा जाए, ताकि किसी एक कंपनी के संकट का बोझ हजारों यात्रियों को न झेलना पड़े।


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