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कर्म, ग्रह और जीवन: शास्त्रीय दृष्टि से एक विवेचना

Bolta Sach News
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Karma, Planets and Life Classical
बोलता सच,धार्मिक : यह सर्वविदित है कि जैसा कर्म मनुष्य करता है, वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है। कर्म का फल कभी नष्ट नहीं होता, वह केवल समय और परिस्थितियों के अनुसार अपना रूप बदल लेता है। जैसे विज्ञान में कहा गया है कि पदार्थ नष्ट नहीं होता, केवल रूपांतरित होता है, उसी प्रकार किया गया कर्म भी देर-सवेर सुख या दुख के रूप में व्यक्ति के जीवन में प्रकट होता है।
प्राचीन धर्मग्रंथों में यह बताया गया है कि पूर्व जन्मों या वर्तमान जीवन के पाप कर्मों के कारण यदि ग्रह प्रतिकूल हो जाएं, तो उन्हें शांत करने के लिए उपासना, यज्ञ, दान और रत्न धारण जैसे उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन अनुभव यह भी बताता है कि यदि हम जड़ साधनों की बजाय सीधे जीवों के प्रति करुणा, सेवा और सद्भाव का भाव रखें, तो ग्रह अपेक्षाकृत शीघ्र प्रसन्न हो सकते हैं।
धर्मशास्त्रों में जीवन की सफलता के अनेक सूत्र संकेत रूप में दिए गए हैं। मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, गुरु देवो भव, अतिथि देवो भव — यह केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और सुखमय बनाने का मार्ग है। शास्त्र कहते हैं कि मात्र प्रणाम करने से, सदाचार का पालन करने से और प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि होती है। जीवों के प्रति परोपकार की भावना रखने से कुंडली में स्थित रुष्ट ग्रहों की तीव्रता भी कम की जा सकती है।
हर व्यक्ति के जीवन पर किसी न किसी ग्रह का विशेष प्रभाव रहता है। यह प्रभाव उसके आचार-विचार, व्यवहार और जीवन की प्रमुख घटनाओं के माध्यम से प्रकट होता है। नवग्रह इस संपूर्ण चराचर जगत में पदार्थ, वनस्पति, पंचतत्व, पशु-पक्षी आदि सभी में किसी न किसी रूप में अपना प्रतिनिधित्व रखते हैं। इसी क्रम में ऋषि-महर्षियों ने पारिवारिक संबंधों और सामाजिक दायित्वों को भी ग्रहों से जोड़ा है।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, सूर्य आत्मा के साथ-साथ पिता का प्रतिनिधित्व करता है, चंद्रमा मन और माता का, मंगल पराक्रम और छोटे भाइयों का, शनि दुख के साथ सेवक और श्रमिक वर्ग का, बृहस्पति ज्ञान के साथ गुरु एवं बड़े भाई का, बुध वाणी और मामा का तथा शुक्र ऐश्वर्य और जीवनसाथी का कारक माना गया है।
इसे सरल शब्दों में समझें तो यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी को कष्ट देता है, तो शुक्र ग्रह स्वाभाविक रूप से कमजोर होने लगता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में ऐश्वर्य, सुख और भौतिक समृद्धि में कमी आने लगती है। इसी प्रकार माता-पिता, गुरु और समाज के प्रति हमारा व्यवहार ग्रहों की अनुकूलता या प्रतिकूलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अतः कर्म, आचरण और संबंधों की शुद्धता ही ग्रहों को संतुलित रखने का सबसे प्रभावी और स्थायी उपाय है।

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