बोलता सच,नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के लिए फांसी के बजाय कम पीड़ादायक तरीका अपनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर की गई थी, जिसमें फांसी को क्रूर, अमानवीय और पुराना तरीका बताया गया है। याचिका में कहा गया कि फांसी के दौरान दोषी को लंबे समय तक दर्द सहना पड़ता है।
याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि फांसी के स्थान पर जहर का इंजेक्शन (लीथल इंजेक्शन) दिया जाए, जिससे कम समय में और कम पीड़ा के साथ मौत हो सके। इसके साथ ही मांग की गई कि कम से कम दोषी को यह विकल्प दिया जाए कि वह फांसी या इंजेक्शन में से किस तरीके को चुनना चाहता है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को बताया कि इस मुद्दे पर विचार के लिए सरकार ने एक समिति गठित की है, जो मौत की सजा के वैकल्पिक तरीकों का अध्ययन कर रही है। हालांकि, केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल सरकार फांसी को ही सबसे तेज और सुरक्षित तरीका मानती है और इसमें बदलाव के पक्ष में नहीं है।
केंद्र के इस रुख पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई और कहा कि समय के साथ बदलाव जरूरी होता है, लेकिन सरकार इस दिशा में तैयार नजर नहीं आ रही। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारतीय संविधान दयालु और जीवंत है और इसमें सम्मानजनक मृत्यु के अधिकार पर भी विचार होना चाहिए।
यह याचिका वर्ष 2017 में दायर की गई थी और तब से इस पर कई बार सुनवाई हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता और केंद्र सरकार दोनों को तीन सप्ताह के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि कई देशों ने फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन जैसे तरीके अपना लिए हैं, जबकि भारत में अब भी कानून के तहत फांसी ही मौत की सजा का निर्धारित तरीका है।
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