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कुशीनगर में अंधेरे में जिंदगी जी रहा नेत्रहीन परिवार: न घर, न पेंशन, न दो वक्त की रोटी; अधिकारी बोले—लापरवाही पर होगी कार्रवाई

Bolta Sach News
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Life in the dark in Kushinagar
बोलता सच ,कुशीनगर। जिले के देवतहा बाली (घोठ्ठा टोला) गांव में एक नेत्रहीन दंपती और उनका परिवार ऐसी जिंदगी जी रहा है जो सरकारी दावों और योजनाओं की हकीकत बयां करती है। 32 वर्षीय रंजीत चौहान और उनकी शारीरिक रूप से दिव्यांग पत्नी रिंकी बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं—न घर है, न शौचालय, न शुद्ध पानी, और न ही डेढ़ साल से बंद पेंशन का सहारा।
रंजीत और रिंकी दोनों बचपन से ही दृष्टिहीन हैं। उनके तीन छोटे बच्चे हैं—बिपिन (5), शशिकला (3) और अर्चिता (1)। गरीबी इस हद तक है कि परिवार दिन में सिर्फ एक वक्त का भोजन कर पाता है। रंजीत बताते हैं, “हम दिन में एक बार ही खाना बनाते हैं ताकि बच्चे भूखे न रहें। कई बार तो बच्चों को सिर्फ पानी पिलाकर सुलाना पड़ता है।”
सरकार की ओर से परिवार को महीने में केवल 5 किलो राशन मिलता है, जो पांच लोगों के लिए अपर्याप्त है। तीन महीने में मिलने वाली ₹3,000 की पेंशन भी पिछले डेढ़ साल से बंद है। रंजीत बताते हैं कि कई बार अधिकारियों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
रंजीत अपने विकलांग भाई संजय चौहान (40) और भाभी शांति के साथ रहते हैं। संजय भी नेत्रहीन हैं और पैर से लाचार हैं। वे गांव में छोटी सी गुमटी लगाकर किसी तरह दो वक्त की रोटी जुटाते हैं। उनके पास न पक्का घर है, न बच्चों के आधार कार्ड बने हैं।
संजय कहते हैं, “हम न चल सकते हैं, न देख सकते हैं। जो भी प्रधान आता है, उससे कहते हैं, लेकिन कुछ नहीं होता। अब तो कोई पूछता भी नहीं। नेता लोग सिर्फ वोट मांगने आते हैं, फिर गायब हो जाते हैं।”
गांव के प्रधान प्रतिनिधि विजय गौतम का कहना है, “सरकार की योजनाओं में विकलांग या गरीबों के लिए अलग से वरीयता नहीं है। इस परिवार के बारे में जानकारी नहीं थी, अब दिखवाऊंगा और जो संभव होगा मदद दिलवाऊंगा।”
मामले पर बीडीओ नेबुआ नौरंगीया आर.के. सेठ ने कहा कि प्रकरण संज्ञान में आया है। उन्होंने प्रधान से रिपोर्ट तलब की है और संबंधित अधिकारियों को मौके पर भेजने के निर्देश दिए हैं। बीडीओ ने कहा, “अगर लापरवाही पाई गई तो कार्रवाई की जाएगी।”

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