बोलता सच,नई दिल्ली: केरल के अलाप्पुझा के 13 वर्षीय मुहम्मद यज़ीन आमतौर पर अपनी की-बोर्ड पर आंखें बंद करके सुर बिखेरते हैं। लेकिन मंगलवार को दिल्ली के एक सभागार में जब उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभाशाली युवाओं में घोषित किया गया, तो उन्होंने आंखें खोलकर जीवन का सबसे बड़ा सम्मान देखा। 80% लोकोमोटर डिसएबिलिटी के बावजूद आंखों पर पट्टी बांधकर की-बोर्ड बजाने का विश्व रिकॉर्ड रखने वाले यज़ीन ने कहा कि अब उन्हें जीवन में कोई चुनौती मुश्किल नहीं लगती। क्रिकेट प्रेमी यज़ीन याद करते हैं कि वे एक बार संजू सैमसन के साथ भी खेल चुके हैं।
राष्ट्रीय दिव्यांगजन सशक्तिकरण पुरस्कार
राष्ट्रीय दिव्यांगजन सशक्तिकरण पुरस्कार 2025 मंगलवार को सिर्फ एक सम्मान समारोह नहीं था, बल्कि उन 32 लोगों की असाधारण यात्राओं का उत्सव था जिन्होंने साबित किया कि क्षमता शरीर से नहीं, बल्कि संकल्प से तय होती है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पुरस्कार प्रदान करते हुए कहा कि दिव्यांगजन को समानता देना हमारी दया नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य है। उन्होंने खासकर उन बेटियों की सराहना की जिन्होंने लैंगिक और शारीरिक दोनों तरह की बाधाओं को पार कर बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। राष्ट्रपति ने सरकार द्वारा दिव्यांगजन सशक्तिकरण के लिए राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं और यूनिक आईडी कार्ड जैसी योजनाओं का भी उल्लेख किया।
कला ही उनकी आवाज बनी
बेंगलुरु की शिबा कोइलपिचाई कई प्रकार की विकलांगताओं के बावजूद 3,000 से अधिक वारली पेंटिंग्स बना चुकी हैं। वे समारोह में कम बोलती रहीं, लेकिन उनकी कला ही उनकी सबसे बड़ी आवाज बनकर सामने आई। उनके चित्र न सिर्फ राष्ट्रपतिभवन और कर्नाटक लोक भवन में लगे हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संग्रहों में भी शामिल हैं। नागपुर की अबोली विजय जरित, जो देश की पहली व्हीलचेयर मॉडल और मोटिवेशनल स्पीकर हैं, अपने परिवार के साथ पुरस्कार लेने पहुंचीं। अबोली कहती हैं कि उनका परिवार ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
दिल्ली के नीति विशेषज्ञ निपुण मल्होत्रा ने ‘Wheels for Life’ जैसी पहलों के जरिए देश में एक्सेसिबिलिटी को नई दिशा दी है, जबकि बेंगलुरु की युवा फोटोग्राफर गायत्री गुप्ता अपनी प्रदर्शनियों और कॉर्पोरेट कार्यशालाओं के माध्यम से न्यूरोडायवर्सिटी के प्रति जागरूकता फैलाती हैं।
लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश चंद्रशेखरन की प्रेरक कहानी
पूरे समारोह में लेफ्टिनेंट कर्नल द्वारकेश चंद्रशेखरन की कहानी सबसे प्रेरक रही। पूरी तरह दृष्टिहीन होने के बावजूद वे भारतीय सशस्त्र बलों में सक्रिय ड्यूटी पर तैनात पहले अधिकारी हैं। उन्होंने राष्ट्रीय तैराकी रिकॉर्ड बनाए, भारत में ब्लाइंड शूटिंग की शुरुआत की और 16,000 फीट की ऊंचाई तक सियाचिन ग्लेशियर पर ट्रेक किया। द्वारकेश का कहना है कि भारत में अंधों के लिए रास्ते खुलने चाहिए और यही सोच उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति देती है।
डिजिटल एक्सेसिबिलिटी में बदलाव
बेंगलुरु की मेधा पाटनगी ने अपनी प्रगतिशील दृष्टि बाधा को पीछे छोड़कर लाखों लोगों के लिए डिजिटल एक्सेसिबिलिटी में क्रांतिकारी काम किया है। मेधा बताती हैं कि उनकी मां ने हमेशा यह विश्वास दिलाया कि भगवान ने उनकी थोड़ी दृष्टि इसलिए ली ताकि वह किसी और को दे सके — और यही सोच उनकी पूरी यात्रा का आधार बनी।
छत्तीसगढ़ के धमतरी के बसंत विकास साहू ने 95% लोकोमोटर डिसएबिलिटी के बावजूद अपनी कला को सम्मान का मार्ग बनाया। वे हाथ पर ब्रश बांधकर आदिवासी जीवन के रंगों को कैनवस पर उतारते हैं और अपने ‘जीवन रंग फाउंडेशन’ के जरिए दिव्यांग और आदिवासी युवाओं को प्रशिक्षण देते हैं।
वडोदरा के राजेश शरद केतकर ने भारतीय सांकेतिक भाषा को नई पहचान दिलाई। उन्होंने ISL आधारित शिक्षण प्रणाली विकसित की और बधिर समुदाय द्वारा संचालित एक समाचार मंच बनाया, जो आज लाखों दर्शकों तक पहुंचता है।
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