बोलता सच,पटना : बिहार चुनाव में जनसुराज की हार से प्रशांत किशोर को भले ही राजनीतिक झटका लगा हो, लेकिन उनके राजनीतिक इरादों में कोई ठहराव नहीं आया है। बिहार की धरती से राजनीति के शिखर तक पहुंचने का लक्ष्य आज भी उनके एजेंडे में बना हुआ है। इसी सोच के तहत प्रशांत किशोर ने जनसुराज के पूरे संगठनात्मक ढांचे को भंग कर यह संकेत दे दिया है कि अब जल्दबाजी में संगठन खड़ा करने के बजाय नए सिरे से, नए कलेवर में एक मजबूत और भरोसेमंद टीम तैयार की जाएगी। चूंकि फिलहाल कोई बड़ा चुनाव सामने नहीं है, इसलिए यह समय संगठन को जमीनी स्तर पर दोबारा गढ़ने का माना जा रहा है।
मजबूत विपक्ष बनने की चुनौती
एनडीए की भारी जीत के बाद बिहार की राजनीति में विपक्ष कमजोर स्थिति में है। राजद नेता तेजस्वी यादव को सदन में कम संख्या बल के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं कांग्रेस और वाम दलों की ताकत भी सिमट गई है। ऐसे माहौल में विपक्षी दलों के मनोबल में गिरावट साफ दिखाई देती है। जनसुराज यदि खुद को जनता के बीच मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है, तो उसे पंचायत से लेकर प्रखंड स्तर तक जनता के रोजमर्रा के मुद्दों को उठाना होगा। आय, आवासीय प्रमाण पत्र, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, दाखिल-खारिज जैसी समस्याओं के समाधान के लिए जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच सेतु बनना होगा। चूंकि सदन में जनसुराज का कोई प्रतिनिधि नहीं है, इसलिए सड़क और जमीनी स्तर पर सक्रिय रहकर मुख्य विपक्ष की भूमिका निभाना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती होगी।
नया साल, नया संगठन
पंचायत से लेकर राज्य स्तर तक सभी संगठनात्मक इकाइयों को भंग किया जाना इस बात का संकेत है कि प्रशांत किशोर अब मजबूत और टिकाऊ संगठन पर फोकस कर रहे हैं। इसके लिए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की जा चुकी है, जिनका काम समर्पित और विश्वसनीय कार्यकर्ताओं की पहचान कर उन्हें जोड़ना होगा। चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं की कमी को लेकर उठी आलोचनाओं को दूर करना भी इस रणनीति का अहम हिस्सा है। अब लक्ष्य ऐसा संगठन खड़ा करना है, जो सिर्फ चुनावी चेहरों या नाम के भरोसे नहीं, बल्कि जमीनी ताकत के बल पर आगे बढ़े।
नया लक्ष्य, नया चुनाव
आने वाले समय में जनसुराज की नजर एमएलसी चुनावों पर हो सकती है। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की कई सीटें 2026 में खाली हो रही हैं। 30 दिसंबर 2025 तक मतदाता सूची अंतिम रूप ले लेगी, जिसके बाद चुनाव प्रक्रिया शुरू होगी। माना जा रहा है कि जनसुराज इन चुनावों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर सकता है। कुल मिलाकर, चुनावी हार के बाद प्रशांत किशोर अब दीर्घकालिक रणनीति के साथ बिहार की राजनीति में नई शुरुआत की तैयारी में जुटे हैं।
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