यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले यूपी में पुलिस भर्ती परीक्षा के पेपर लीक से युवा वर्ग की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ी थी। ऐसे में सरकार किसी भी ऐसे फैसले से बचना चाहती है, जिससे युवाओं या किसी बड़े सामाजिक वर्ग की नाराजगी बढ़े।
इस मुद्दे पर जब पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह से सवाल किया गया तो उन्होंने साफ तौर पर कोई टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि वे अभी इस कानून का अध्ययन कर रहे हैं। उनके इस बयान से साफ है कि वरिष्ठ भाजपा नेता भी फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
क्यों हो रहा है नियमों का विरोध?
यूजीसी ने 15 जनवरी 2026 से देशभर के सभी यूजीसी से संबद्ध विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में यह नियम लागू किया है। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव को खत्म करना बताया गया है। नए नियमों के तहत अब अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी जातीय भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है।
इसके तहत एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी किसी भी प्रकार के भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम अधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकेंगे। इसी बिंदु को लेकर सवर्ण समाज के संगठनों में नाराजगी है।
नए कोषांग और समितियों का गठन
यूजीसी के नियमों के अनुसार, हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन अनिवार्य किया गया है। विश्वविद्यालय स्तर पर एक समानता समिति बनेगी, जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी के साथ महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। यह समिति हर छह महीने में रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी को भेजेगी, जिसके आधार पर संस्थानों की स्थिति का आकलन किया जाएगा।
सवर्ण समाज की आपत्ति क्या है?
सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि नए नियमों के तहत उनके खिलाफ झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की आशंका बढ़ जाएगी। उनका आरोप है कि किसी भी शिकायत के बाद उन्हें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी, जिससे नियमों के दुरुपयोग का रास्ता खुलेगा।
सवर्ण संगठनों का तर्क है कि विश्वविद्यालयों में पहले से ही शिकायत निवारण की व्यवस्था मौजूद है, फिर अलग से नया तंत्र बनाना असमानता को बढ़ावा देगा। उनका यह भी कहना है कि ओबीसी वर्ग को पहले ही 1990 से प्रवेश में और 2010 से फैकल्टी नियुक्तियों में आरक्षण मिल रहा है, ऐसे में नया कानून सवर्ण समाज पर अतिरिक्त दबाव बनाने की कोशिश है।
यति नरसिंहानंद के बयान से बढ़ा विवाद
इस मुद्दे पर डासना देवी मंदिर के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि के बयान से विवाद और गरमा गया। उन्होंने जंतर-मंतर पर धरने की घोषणा की थी, लेकिन दिल्ली बॉर्डर पर ही उन्हें रोक दिया गया। यति नरसिंहानंद ने सवाल उठाया कि ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार जैसे सवर्ण वर्गों के हितों की बात कौन करेगा और अगर उनके साथ भेदभाव होता है तो वे कहां शिकायत करेंगे।
कानून वापस लिए जाने की अटकलें
विरोध के लगातार तेज होते स्वर और चुनावी साल को देखते हुए अब यूजीसी स्तर पर इस कानून पर पुनर्विचार की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार और यूजीसी इस नियम को वापस लेने या इसमें संशोधन करने पर विचार कर सकते हैं। बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव ने सरकार को अपनी नीति पर दोबारा सोचने को मजबूर कर दिया है।
कुल मिलाकर, ‘समानता नियम–2026’ शिक्षा सुधार से ज्यादा अब एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है, जिसका असर आने वाले चुनावों पर भी देखने को मिल सकता है।