बोलता सच,धार्मिक दृष्टि : पौष मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली अमावस्या को पौष अमावस्या कहा जाता है। यह वर्ष की अंतिम अमावस्या होने के कारण धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखती है। इसे छोटा पितृ पक्ष भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए तर्पण, दान और श्राद्ध कर्म से पितरों की विशेष कृपा प्राप्त होती है और सात जन्मों तक शुभ फल मिलते हैं। शास्त्रों के अनुसार अमावस्या के दिन पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने परिजनों के सत्कर्मों से प्रसन्न होकर उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
पौष अमावस्या की तिथि
पंचांग के अनुसार पौष मास की अमावस्या तिथि 19 दिसंबर (शुक्रवार) सुबह 4:59 बजे से शुरू होकर 20 दिसंबर (शनिवार) सुबह 6:13 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार 19 दिसंबर को ही स्नान, दान और पितृ तर्पण जैसे शुभ कार्य किए जाएंगे।
पौष अमावस्या का धार्मिक महत्व
पौष अमावस्या पितरों को समर्पित मानी जाती है। इस दिन विधि-विधान से तर्पण और दान करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है तथा परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। मान्यता है कि पौष अमावस्या पर किया गया दान कई गुना फलदायी होता है। विशेष रूप से अन्न, वस्त्र, तिल और गुड़ का दान अत्यंत शुभ माना गया है। जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए यह तिथि अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।
पौष अमावस्या पर दान का महत्व
इस दिन तर्पण के साथ-साथ दान-पुण्य का विशेष महत्व है। अन्न, वस्त्र, कंबल, तिल, गुड़ और घी का दान पुण्यदायी माना गया है। जरूरतमंदों को भोजन कराना, गौ सेवा करना और मंदिर में दीपदान करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सीधे पितरों तक पहुंचता है।
पितरों का तर्पण कैसे करें?
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ब्रह्म मुहूर्त में नदी, सरोवर या घर पर स्नान करें।
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साफ और हल्के रंग के वस्त्र धारण करें तथा पितरों का स्मरण करें।
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आटे या चावल के पिंड बनाकर कौओं और गाय को खिलाएं।
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दक्षिण दिशा में दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
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घर में बना सादा भोजन पितरों को समर्पित करें और बाद में गाय या गरीबों को दे दें।
इन विधियों का पालन करने से पितृ दोष शांत होता है और जीवन की बाधाएं दूर होने की मान्यता है।
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