बोलता सच,लखनऊ : उत्तर प्रदेश सरकार ने मदरसा शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान से जुड़े विधेयक को वापस ले लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव को रद्द करने को मंजूरी दी गई। सरकार के इस फैसले के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है और विपक्षी दलों ने इसे अल्पसंख्यकों के हितों से जोड़कर सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है।
समाजवादी पार्टी के विधायक शिवपाल यादव ने आरोप लगाया कि भाजपा केवल बयानबाजी करती है और ज़मीनी स्तर पर काम नहीं करती। वहीं, सुभासपा प्रमुख और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि यह विधेयक नियमों की विसंगतियों के कारण वापस लिया गया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 में यह बिल पास हुआ था और बाद में राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति के पास भेजा गया, जहां इस पर आपत्तियां दर्ज की गईं। 2022 में इसे दोबारा विधानसभा में लाया गया, लेकिन विसंगतियों के चलते इसे फिर अस्वीकार कर दिया गया। अब अंततः सरकार ने इस विधेयक को वापस लेने का फैसला किया है।
उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि अगर कोई प्रस्ताव देश और प्रदेश के हित में नहीं होता, तो सरकार उस पर गंभीरता से विचार कर निर्णय लेती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फैसला भी उसी प्रक्रिया के तहत लिया गया है।
सपा विधायक मो. हसन रूमी ने सरकार पर अल्पसंख्यकों का भरोसा खोने का आरोप लगाते हुए कहा कि शिक्षा से जुड़े फैसलों में सरकार को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। वहीं, भारतीय सूफी फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सूफी कशिश वारसी ने कहा कि विधेयक रद्द करने के कारणों को समझे बिना राजनीति नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील की कि वे तथ्यों को जानकर ही कोई राय बनाएं।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश मदरसा (अध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन का भुगतान) विधेयक वर्ष 2016 में सपा सरकार के दौरान पास हुआ था। इस विधेयक के तहत मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच या मुकदमे की अनुमति नहीं थी। तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने इसे संविधान के अनुरूप न मानते हुए राष्ट्रपति के पास भेज दिया था। इसके बाद यह विधेयक लागू नहीं हो सका और अब योगी सरकार ने इसे औपचारिक रूप से वापस ले लिया है।
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