बोलता सच,नई दिल्ली: लोकसभा में हाल ही में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025’ नाम का एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया गया है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को काम के निर्धारित समय के बाद कार्य संबंधी कॉल या ईमेल का जवाब देने की बाध्यता से मुक्त करना और उनके वर्क-लाइफ बैलेंस को बेहतर बनाना है। यह बिल एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले द्वारा पेश किया गया।
कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव
विधेयक में ‘कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण’ के गठन का प्रस्ताव है, जो 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों में राइट टू डिस्कनेक्ट के प्रावधान को लागू करेगा। यह संस्था कार्य समय के बाद काम से संबंधित नीतियों पर चर्चा करने और अध्ययन कर दिशा-निर्देश तैयार करने की जिम्मेदारी निभाएगी।
काम के बाद जवाब न देने पर नहीं होगी कार्रवाई
प्रस्तावित कानून के अनुसार, कोई कर्मचारी यदि निर्धारित कार्य समय के बाद कॉल या ईमेल का जवाब देने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ किसी भी तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।
अगर कर्मचारी से निर्धारित समय से अधिक काम कराया जाता है, तो नियोक्ता को ओवरटाइम वेतन देना अनिवार्य होगा।
डिजिटल डिटॉक्स सेंटर और काउंसलिंग सेवाओं का प्रस्ताव
विधेयक में ‘टेलीप्रेशर’, तनाव और ‘इन्फो-ओबेसिटी’ जैसे डिजिटल दबावों से निपटने के लिए डिजिटल डिटॉक्स सेंटर्स और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र स्थापित करने की भी बात कही गई है।
अन्य देशों में पहले से लागू
फ्रांस, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में राइट टू डिस्कनेक्ट पहले ही लागू है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कर्मचारी कल्याण की बढ़ती स्वीकृति को दिखाता है। भारत के इस प्रस्तावित कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई कंपनी नियमों का पालन नहीं करती, तो उस पर कुल कर्मचारी वेतन बिल के 1% तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
क्या होता है निजी सदस्य विधेयक?
निजी सदस्य विधेयक वह होता है जिसे किसी गैर-मंत्री सांसद द्वारा संसद में पेश किया जाता है। ऐसे विधेयकों पर आमतौर पर शुक्रवार को चर्चा होती है, और इनके पारित होने की संभावना बेहद कम होती है।
आजादी के बाद केवल 14 निजी विधेयक ही बने कानून
स्वतंत्रता के बाद से अब तक सिर्फ 14 निजी सदस्य विधेयक दोनों सदनों से पारित होकर कानून बन पाए हैं। वर्ष 1970 के बाद से कोई भी निजी सदस्य विधेयक दोनों सदनों से पास नहीं हुआ है।
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