बोलता सच,नई दिल्ली: मुंबई में जन्मे ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी इन दिनों भारत की स्थितियों को लेकर गहरी चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि मोदी सरकार के दौर में अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ा है। गौरतलब है कि रुश्दी की विवादित किताब द सैटेनिक वर्सेज पर लगा प्रतिबंध दो साल पहले हटाने का रास्ता साफ हुआ था।
हिंदू राष्ट्रवाद को बताया बढ़ती चिंता का कारण
ब्लूमबर्ग ने एक्स पर रुश्दी के इंटरव्यू का हवाला देते हुए लिखा कि लेखक भारत में बढ़ते हिंदू राष्ट्रवाद और फ्री स्पीच पर लग रहे प्रतिबंधों से बहुत चिंतित हैं। मिशाल हुसैन से बातचीत में रुश्दी ने कहा कि उन्होंने एक दशक पहले ही इन संकेतों को महसूस कर लिया था।
‘इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश’
इंटरव्यू में रुश्दी ने कहा कि भारत में उनके बहुत से दोस्त— लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार और प्रोफेसर— मौजूदा माहौल से परेशान हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि भारत के इतिहास को इस तरह से फिर से लिखा जा रहा है कि उसमें हिंदुओं को ‘अच्छा’ और मुसलमानों को ‘खराब’ दिखाया जाए।
उन्होंने वी.एस. नायपॉल के संदर्भ में कहा कि यह सोच भारत को एक ‘घायल सभ्यता’ की तरह पेश करती है, जिसे मुस्लिम शासन ने आहत किया था।
रुश्दी खुद हिंसक हमलों का सामना कर चुके हैं
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2025 में भारत 151वें स्थान पर है, हालांकि यह पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ा बेहतर है। भारतीय नेता इन रैंकिंग पर पश्चिमी देशों की पक्षपातपूर्ण सोच का आरोप लगाते रहे हैं।
सलमान रुश्दी खुद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर हिंसा का शिकार रह चुके हैं।
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2022 में हादी मातर नाम के युवक ने उन पर चाकू से 17 बार हमला किया था, जिसके बाद उनकी एक आंख चली गई।
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1989 से वह ईरानी धार्मिक नेता अयातुल्ला खमैनी के फतवे का सामना कर रहे हैं।
आलोचकों ने उठाए सवाल
रुश्दी के हालिया बयानों ने आलोचकों के एक वर्ग को नाराज़ कर दिया है। उनका कहना है कि 1988 में द सैटेनिक वर्सेज को भारत में कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम दबाव में आकर बैन किया था, जबकि 2024 में मोदी सरकार के दौरान उस प्रतिबंध को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।
कमेंटेटर मोनिका वर्मा ने एक्स पर लिखा—
“मुस्लिम कट्टरपंथियों के कारण एक आंख खो चुके सलमान रुश्दी को हिंदू राष्ट्रवाद की चिंता सता रही है। वे जानते हैं कि दूसरी आंख की सुरक्षा के लिए किसे निशाना बनाना है।”
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