बोलता सच,नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में राज्य बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चुनावों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अधिवक्ताओं के लिए सीटों में आरक्षण के निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह का आरक्षण केवल अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में विधायी संशोधन के जरिए ही लागू किया जा सकता है, न कि न्यायालय के परमादेश से।
पीठ ने यूनिवर्सल डॉ. अंबेडकर एडवोकेट्स एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पेशेवर और स्व-नियामक निकायों के चुनावी ढांचे में बदलाव न्यायिक हस्तक्षेप के बजाय विधायी प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है।
क्या थी याचिका
यह मामला यूनिवर्सल डॉ. अंबेडकर एडवोकेट्स एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य (डब्ल्यूपी (सी) संख्या 6/2026) से जुड़ा है। याचिका में अधिवक्ता अधिनियम की धारा 3(2)(ख) के तहत बार काउंसिल चुनावों में हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व या उपयुक्त कानून बनने तक अंतरिम रूप से सीट आरक्षण की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जहां महिलाओं और दिव्यांग अधिवक्ताओं के लिए समावेशिता के उपाय अपनाए गए हैं, वहीं एससी और एसटी समुदाय के वकील अब भी प्रतिनिधित्व से वंचित हैं।
न्यायालय ने क्यों किया हस्तक्षेप से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि संसद के विधायी क्षेत्र में न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती। पीठ ने कहा कि भले ही समावेशिता के संवैधानिक लक्ष्य सराहनीय हैं, लेकिन चुनावी तंत्र में बदलाव के लिए अधिवक्ता अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह भी उल्लेख किया कि कई राज्यों में बार काउंसिल के चुनाव पहले से ही चल रहे हैं और इस स्तर पर किसी तरह का निर्देश देना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने मौखिक टिप्पणी में कहा, “इस स्तर पर बहुत देर हो चुकी है।”
विधायी रास्ता ही विकल्प
पीठ ने कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि ऐसा आरक्षण केवल कानून में संशोधन के जरिए ही संभव है। तेलंगाना राज्य बार काउंसिल और बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी हाईकोर्ट के समक्ष स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे को सक्षम प्राधिकारी के सामने उठाया गया है और इस पर विचार चल रहा है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सक्षम अधिकारियों से संपर्क करने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया और भविष्य में विधायी या प्रशासनिक कार्रवाई की संभावना को खुला रखा, लेकिन फिलहाल किसी भी तरह का दिशा-निर्देश या अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया।
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