बोलता सच,प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने झूठी सूचना के आधार पर दर्ज कराई गई FIR को लेकर पुलिस और विवेचना अधिकारियों के लिए कड़ा निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस जांच में यह साबित हो जाए कि FIR झूठी थी या जानबूझकर गुमराह करने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई थी, तो विवेचना अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले व्यक्ति के खिलाफ झूठी गवाही और गलत सूचना देने के संबंध में लिखित परिवाद (कंप्लेंट) दर्ज कराए।
हाई कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि विवेचना अधिकारी इस दायित्व का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 199(बी) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि कानून का दुरुपयोग करने वालों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता और झूठी शिकायतें न्याय व्यवस्था पर बोझ डालती हैं।
इसके साथ ही कोर्ट ने असंज्ञेय अपराधों (नॉन-कॉग्निजेबल मामलों) को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पुलिस द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट को ‘स्टेट केस’ नहीं माना जाएगा, बल्कि उसे परिवाद (कंप्लेंट) के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इस संबंध में जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की पीठ ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) द्वारा पारित एक आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक असंज्ञेय मामले में पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञेय अपराध की तरह संज्ञान ले लिया गया था।
क्या है पूरा मामला
मामला अलीगढ़ जिले के क्वार्सी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। यहां एक पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। आरोप था कि पत्नी कोरिया में किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है और सोशल मीडिया के माध्यम से उसे और उसकी बेटी को बदनाम कर रही है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि भारत लौटने पर पत्नी ने जान से मारने की धमकी दी थी। इन आरोपों के आधार पर शांतिभंग, अपमान और अज्ञात संचार द्वारा आपराधिक धमकी देने का मामला दर्ज कराया गया।
पुलिस जांच के बाद यह मामला झूठा पाया गया और 19 जून 2024 को फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी गई। इसके बाद पति ने इस रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की। 23 अक्टूबर 2024 को अलीगढ़ के सीजेएम ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करते हुए फाइनल रिपोर्ट को खारिज कर दिया और मामले को स्टेट केस के रूप में चलाने का आदेश दे दिया।
हाई कोर्ट ने सीजेएम के इस आदेश को गलत ठहराते हुए निरस्त कर दिया और साफ कहा कि असंज्ञेय मामलों में इस तरह की प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं है। कोर्ट का यह फैसला झूठी शिकायतों पर लगाम लगाने और जांच अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
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