बोलता सच,नई दिल्ली : कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) से जुड़े करोड़ों कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट से अहम राहत भरी खबर आई है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को ईपीएफओ योजना के तहत लागू वेतन सीमा (वेज सीलिंग) में बदलाव पर विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए सरकार को चार महीने की समय सीमा तय की है। गौरतलब है कि ईपीएफओ की वेतन सीमा पिछले 11 वर्षों से संशोधित नहीं की गई है, जिसके चलते बड़ी संख्या में कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रह गए हैं।
याचिका पर सुनवाई के बाद आदेश
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चंदुरकर की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार के समक्ष अपना अभ्यावेदन और कोर्ट के आदेश की प्रति प्रस्तुत करें। इसके बाद केंद्र सरकार को चार महीने के भीतर इस पर फैसला लेना होगा।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वर्तमान ईपीएफओ नियमों के तहत 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से पीएफ के दायरे में नहीं लाया जाता। यह सीमा आखिरी बार वर्ष 2014 में संशोधित की गई थी।
क्या है ईपीएफओ में ₹15,000 की वेतन सीमा?
ईपीएफ नियमों में ₹15,000 की सीमा अनिवार्य और स्वैच्छिक सदस्यता के बीच की रेखा मानी जाती है। ईपीएफ योजना, 1952 के पैरा 2(f) के अनुसार, ऐसा कर्मचारी जिसका मूल वेतन और महंगाई भत्ता (डीए) नौकरी जॉइन करते समय निर्धारित सीमा से अधिक हो और जो पहले से ईपीएफ सदस्य न हो, उसे ‘अपवर्जित कर्मचारी’ माना जाता है।
इसका मतलब यह है कि यदि किसी कर्मचारी का बेसिक वेतन और डीए ₹15,001 है, तो उसके लिए पीएफ सदस्यता अनिवार्य नहीं होती। हालांकि, नियोक्ता की सहमति से वह स्वेच्छा से ईपीएफ का सदस्य बन सकता है।
न्यूनतम वेतन से टकराव का मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने अदालत को बताया कि बीते एक दशक में वेतन सीमा में संशोधन न होने से गंभीर विरोधाभास पैदा हो गया है। उन्होंने तर्क दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित न्यूनतम वेतन अब 15,000 रुपये की ईपीएफओ सीमा से अधिक हो चुका है।
याचिका में कहा गया कि इस विसंगति के कारण संगठित क्षेत्र के अधिकांश श्रमिक ईपीएफओ जैसी सामाजिक सुरक्षा योजना के लाभों से वंचित रह जाते हैं। साथ ही यह भी दलील दी गई कि वेतन सीमा के आधार पर कर्मचारियों को योजना से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
लाखों कर्मचारियों के लिए उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश संगठित क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों के लिए उम्मीद की किरण माना जा रहा है। यदि केंद्र सरकार वेतन सीमा में संशोधन करती है, तो वे कर्मचारी भी ईपीएफ के सामाजिक सुरक्षा दायरे में आ सकेंगे, जो फिलहाल 15,000 रुपये से अधिक मूल वेतन के कारण इससे बाहर हैं। अब सभी की नजरें अगले चार महीनों में केंद्र सरकार द्वारा लिए जाने वाले फैसले पर टिकी हैं।
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