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पश्चिम बंगाल SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की डेडलाइन एक हफ्ते बढ़ी

Bolta Sach News
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Supreme Court on West Bengal SIR dispute
बोलता सच,नई दिल्ली :  पश्चिम बंगाल में इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। इस मामले में आज शीर्ष अदालत ने अहम दिशा-निर्देश जारी करते हुए निर्वाचन आयोग को बड़ी राहत दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने SIR की समयसीमा एक सप्ताह के लिए बढ़ाने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया पूरी करने और उसके बाद फाइनल वोटर लिस्ट प्रकाशित करने के लिए निर्वाचन आयोग को अतिरिक्त समय दिया जा रहा है। अब यह डेडलाइन 14 फरवरी से एक सप्ताह आगे बढ़ा दी गई है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR में लगे सभी अधिकारी जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को रिपोर्ट करेंगे, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अनुशासन को लेकर भी सख्त रुख अपनाया। बहस के दौरान एक साथ कई वकीलों के बोलने पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अदालत कोई बाजार नहीं है, यहां गरिमा और अनुशासन बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक-दूसरे की बात काटने से सुनवाई में बाधा आती है।

इस मामले में चुनाव आयोग ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्वों ने SIR से जुड़े नोटिस जला दिए हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि SIR प्रक्रिया में किसी भी तरह की रुकावट बर्दाश्त नहीं की जाएगी और कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

कोर्ट ने यह भी संज्ञान लिया कि राज्य सरकार ने चुनाव आयोग को 8,505 ग्रुप-बी अधिकारियों की सूची सौंपी है, जिन्हें प्रशिक्षण देकर SIR प्रक्रिया में लगाया जा सकता है। हालांकि निर्वाचन आयोग के वकील ने कहा कि अभी तक उन्हें इन अधिकारियों के नाम प्राप्त नहीं हुए हैं। वहीं, बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि कोर्ट के सुझाव के बाद ही यह सूची तैयार की गई है और ईमेल के जरिए आयोग को भेज दी गई है।

ममता बनर्जी की ओर से दाखिल याचिका में SIR प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के जरिए समाज के कमजोर वर्गों के लाखों मतदाताओं के नाम काटे जा सकते हैं। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया था कि नामों की वर्तनी में अंतर या स्थानीय बोली के कारण किसी भी वास्तविक मतदाता को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने भरोसा दिलाया है कि कोई भी वास्तविक मतदाता अपना अधिकार नहीं खोएगा और इस पूरे मामले में व्यावहारिक और संतुलित समाधान निकाला जाएगा।

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