बोलता सच,नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) समेत कई याचिकाकर्ताओं की उन याचिकाओं पर 1 दिसंबर को सुनवाई करने पर सहमति दे दी, जिनमें ‘उम्मीद’ पोर्टल पर देशभर की वक्फ संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण के लिए समय सीमा बढ़ाने की मांग की गई है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह निर्णय वकील फुजैल अहमद अय्यूबी की इस दलील पर लिया कि पंजीकरण की समयसीमा समाप्त होने वाली है, ऐसे में मामले की तत्काल सुनवाई आवश्यक है।
AIMPLB और AIMIM नेताओं की याचिका
इन याचिकाओं में AIMPLB के साथ-साथ AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और अन्य कई सामाजिक संगठनों ने भी भाग लिया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि:
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वक्फ संपत्तियों के लिए तय की गई छह महीने की अनिवार्य पंजीकरण अवधि जल्द समाप्त होने वाली है
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देशभर में हजारों संपत्तियों का रिकॉर्ड एकत्र करने में अधिक समय की आवश्यकता है
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तकनीकी दिक्कतों के कारण ‘उम्मीद पोर्टल’ पर सभी विवरण समय पर अपलोड करना चुनौतीपूर्ण है
इसके चलते उन्होंने कोर्ट से समय सीमा बढ़ाने की मांग की है।
15 सितंबर के आदेश का संदर्भ
उल्लेखनीय है कि 15 सितंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई थी। कोर्ट ने जिन अहम प्रावधानों पर रोक लगाई थी, उनमें शामिल है:
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यह शर्त कि केवल पिछले पाँच वर्षों से इस्लाम धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति ही वक्फ बना सकता है
हालाँकि, कोर्ट ने पूरे अधिनियम को स्थगित करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था और कहा था कि कानून को संवैधानिक रूप से वैध मानने की पूर्वधारणा रहती है।
‘उपयोग के आधार पर वक्फ’ पर कोर्ट का रुख
केंद्र सरकार द्वारा ‘उपयोग के आधार पर वक्फ’ प्रावधान हटाए जाने को लेकर अदालत ने कहा था कि:
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यह निर्णय प्रथम दृष्टया मनमाना नहीं है
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यह तर्क कि सरकार वक्फ की जमीन हड़प लेगी, “अमान्य” है
‘उपयोग आधारित वक्फ’ उस व्यवस्था को कहा जाता है, जिसमें किसी भूमि या संपत्ति को उसके धार्मिक उपयोग के आधार पर वक्फ मान लिया जाता है।
क्या है उम्मीद पोर्टल?
6 जून 2025 को केंद्र सरकार ने
“Unified Management, Empowerment, Efficiency and Development (UMMEED)”
नामक राष्ट्रीय पोर्टल लॉन्च किया था। इसके तहत:
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देशभर की सभी पंजीकृत वक्फ संपत्तियों का
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जियो-टैगिंग,
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डिजिटल दस्तावेज़ीकरण
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और ऑनलाइन रिकॉर्ड
छह महीने के भीतर पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य किया गया है।
इसी समय सीमा को बढ़ाने के लिए विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों ने शीर्ष अदालत से गुहार लगाई है, जिसकी सुनवाई अब 1 दिसंबर को होगी।
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