बोलता सच,नई दिल्ली : अरावली पर्वतमाला को लेकर कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस ने एक बार फिर मोदी सरकार पर अरावली की परिभाषा बदलने को लेकर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि इस मुद्दे पर पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का हालिया स्पष्टीकरण शंकाओं को दूर करने के बजाय और बढ़ाने वाला है।
भूपेंद्र यादव ने सोमवार को कांग्रेस पर अरावली की नई परिभाषा को लेकर गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि अरावली पर्वत श्रृंखला के कुल क्षेत्रफल का केवल 0.19 प्रतिशत हिस्सा ही कानूनी रूप से खनन पट्टों के अंतर्गत आता है और मोदी सरकार अरावली के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
इस पर जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर के जिस क्षेत्र का हवाला मंत्री दे रहे हैं, वह भ्रामक है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस आंकड़े में चार राज्यों के 34 जिलों का पूरा भौगोलिक क्षेत्र शामिल कर लिया गया है, जबकि वास्तविक आधार उन जिलों के भीतर मौजूद अरावली पर्वत श्रृंखला का क्षेत्र होना चाहिए।
रमेश ने कहा कि यदि वास्तविक अरावली क्षेत्र को आधार बनाया जाए, तो 0.19 प्रतिशत का आंकड़ा बेहद कम साबित होगा। उन्होंने दावा किया कि जिन 34 जिलों में से 15 जिलों के आंकड़े सत्यापित किए जा सकते हैं, वहां कुल भूमि का लगभग 33 प्रतिशत हिस्सा अरावली क्षेत्र में आता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि नई परिभाषा के तहत अरावली का कितना हिस्सा संरक्षण से बाहर कर दिया जाएगा और खनन या अन्य विकास कार्यों के लिए खोला जाएगा।
कांग्रेस नेता ने चेतावनी दी कि संशोधित परिभाषा के कारण 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली कई पहाड़ियां भी संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकती हैं। इससे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में अरावली की पहाड़ी पट्टियां रियल एस्टेट विकास के लिए खोल दी जाएंगी, जिससे पर्यावरण पर गंभीर दबाव पड़ेगा।
जयराम रमेश ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार सरिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाओं को फिर से परिभाषित कर खनन को अनुमति देने की कोशिश कर रही है और इस दौरान पारिस्थितिकी तंत्र के आपसी जुड़ाव को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र का विखंडन उसके संतुलन को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाता है।
कांग्रेस ने दोहराया कि अरावली भारत की प्राकृतिक विरासत का अहम हिस्सा है और इसके व्यापक संरक्षण और पुनर्स्थापन की जरूरत है। जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि सरकार आखिर अरावली को फिर से परिभाषित क्यों करना चाहती है, इसका उद्देश्य क्या है और किसके हित में यह कदम उठाया जा रहा है।
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