बोलता सच,नई दिल्ली। Supreme Court of India ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों के खिलाफ दायर नई याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई है। यह याचिका उन लोगों की ओर से दायर की गई है जिनके नाम Election Commission of India द्वारा मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
मामले की सुनवाई Surya Kant और Joymalya Bagchi की पीठ के समक्ष हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता Menaka Guruswamy ने दलील दी कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे पहले मतदान कर चुके मतदाता हैं, लेकिन अब उनके दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक अधिकारियों के निर्णयों पर अपील की तरह नहीं बैठ सकता। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता ने मामले को सुनवाई योग्य बताते हुए आग्रह किया, जिसके बाद पीठ ने मंगलवार को इस पर विस्तृत सुनवाई करने का फैसला किया।
इससे पहले 24 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के लिए सिविल जजों की तैनाती की अनुमति दी थी। इसके तहत लगभग 250 जिला जजों के साथ झारखंड और ओडिशा के न्यायिक अधिकारियों को भी तैनात किया गया था। इन अधिकारियों को मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़े करीब 80 लाख दावों और आपत्तियों के निपटारे की जिम्मेदारी दी गई है।
Sujay Paul, जो Calcutta High Court के मुख्य न्यायाधीश हैं, ने 22 फरवरी को भेजे गए एक पत्र में बताया था कि 250 जिला जजों को भी इन दावों के निपटारे में लगभग 80 दिन का समय लग सकता है।
एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 2002 की मतदाता सूची से वंशानुक्रम जोड़ने में कई तार्किक विसंगतियां भी सामने आई हैं। इनमें माता-पिता के नाम का मेल न होना और मतदाता तथा उसके माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम या 50 साल से अधिक का अंतर शामिल है।
इससे पहले 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वह एसआईआर प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा बर्दाश्त नहीं करेगा। अदालत ने पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक को चुनाव आयोग के नोटिस जलाने के आरोपों से जुड़े मामले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया था।
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