बोलता सच,गाजियाबाद : “तीन साल से हम लड़ाई लड़ रहे थे। कौन माता-पिता चाहेंगे कि अपने बेटे को इस तरह विदा करें। लेकिन हरीश जैसे न जाने कितने लोग होंगे जो इसी तरह जिंदगी और मौत के बीच पड़े हैं। हम तो बस यही चाहते हैं कि जनहित में उनका भी भला हो।”
ये शब्द उस पिता के हैं, जिन्होंने अपने बेटे के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी। एक मां, जो पिछले करीब 13 वर्षों से अपने बेटे की देखभाल में लगी रही, आखिरकार तब टूट गई जब ठीक होने की उम्मीद लगभग खत्म हो गई।
गाजियाबाद निवासी हरीश राणा की जिंदगी 2013 में एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई। उस समय वह चंडीगढ़ में पंजाब यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे और वेटलिफ्टिंग में करियर बनाने का सपना देख रहे थे। लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने उनके सारे सपने तोड़ दिए।
चौथी मंजिल से गिरने के बाद कोमा में चले गए
2013 में रक्षाबंधन के अगले दिन हरीश अपने पीजी में थे। वह फोन पर अपनी बहन से बात कर रहे थे कि अचानक चौथी मंजिल से गिर पड़े। गिरने से उनके सिर में गंभीर चोट आई और वह कोमा में चले गए। इसके बाद वह कभी होश में नहीं आ सके और लंबे समय तक लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ही जिंदा रहे।
बेटे के इलाज में परिवार ने सब कुछ लगा दिया
हादसे के बाद हरीश को इलाज के लिए पहले चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में भर्ती कराया गया। करीब तीन महीने तक इलाज के बावजूद जब हालत में सुधार नहीं हुआ तो उन्हें दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित बताया, जिसमें शरीर के चारों अंग काम करना बंद कर देते हैं।
बेटे के इलाज के लिए परिवार ने हर संभव कोशिश की। यहां तक कि माता-पिता को दिल्ली स्थित अपना तीन मंजिला घर भी बेचना पड़ा। कई लोगों ने आर्थिक मदद की पेशकश की, लेकिन उनके पिता ने आत्मसम्मान के चलते उसे स्वीकार नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट से मिली इच्छामृत्यु की अनुमति
करीब 13 साल तक कोमा में रहने के बाद जब डॉक्टरों ने ठीक होने की उम्मीद बेहद कम बताई, तो परिवार ने अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।
अंगदान से बच सकती हैं कई जिंदगियां
क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. अरविंद डोगरा के अनुसार, यदि मेडिकल जांच में अंग स्वस्थ पाए जाते हैं तो हरीश के लीवर, किडनी, फेफड़े और आंखों के कॉर्निया दान किए जा सकते हैं। इससे चार लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है। इसके अलावा यदि उनका दिल भी सही स्थिति में हुआ तो एक और मरीज की जान बचाई जा सकती है। हरीश के माता-पिता ने अपने बेटे के अंगदान का फैसला लिया है, ताकि उनके जाने के बाद भी कई लोगों को जीवन मिल सके।
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