उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “मैं कहीं भी रहूं, मेरे अंदर एक बिहार हमेशा साथ चलता है। यहां बिताए 15-20 साल मेरी पहचान का अहम हिस्सा हैं।”
मिट्टी से जुड़ाव और यादें
1954 में एक मारवाड़ी परिवार में जन्मे अनिल अग्रवाल ने संघर्ष के दम पर अपना वैश्विक कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया। उन्होंने अपने संदेश में बिहार की संस्कृति और जीवनशैली का जिक्र करते हुए कहा कि लिट्टी-चोखा की खुशबू, छठ पूजा का उल्लास और कठिन परिस्थितियों से जूझने की क्षमता उन्हें हमेशा प्रेरित करती है।
उन्होंने कहा कि बिहार के लोगों से लगातार मिलने वाले संदेश उन्हें अपने राज्य से गहरे जुड़ाव का एहसास कराते हैं। उन्होंने बिहार की ऐतिहासिक विरासत—नालंदा की ज्ञान परंपरा और आर्यभट्ट जैसी महान प्रतिभाओं—का भी उल्लेख किया और कहा कि आज दुनिया भर में बिहारी युवा अपनी पहचान बना रहे हैं।
युवाओं को दिया संदेश
अनिल अग्रवाल ने बिहार के युवाओं को प्रेरित करते हुए तीन महत्वपूर्ण बातें कही—
- बड़े सपने देखें,
- अपनी जड़ों से जुड़े रहें,
- और जहां भी जाएं, गर्व से खुद को बिहारी कहें।
निवेश को लेकर कही अहम बात
उन्होंने स्वीकार किया कि वे लंबे समय से बिहार में निवेश का अवसर तलाश रहे हैं, लेकिन इसके लिए भावनाओं के साथ-साथ व्यवहारिकता (feasibility) भी जरूरी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही राज्य में निवेश की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।
‘नंद घर’ जैसा मॉडल लाने की इच्छा
अग्रवाल ने यह भी इच्छा जताई कि जिस तरह उन्होंने राजस्थान में 10,000 से अधिक ‘नंद घर’ केंद्र स्थापित कर बच्चों और महिलाओं को सशक्त बनाया है, उसी तरह बिहार में भी ऐसे केंद्र शुरू किए जाएं। इन केंद्रों के माध्यम से छोटे बच्चों को पोषण और शिक्षा तथा महिलाओं को कौशल विकास के जरिए आत्मनिर्भर बनाया जाता है।
भविष्य को लेकर उम्मीद
अपने संदेश के अंत में उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में बिहार देश की विकास गाथा में एक नई पहचान बनाएगा। उन्होंने उत्साह के साथ कहा—“हम बिहारी, सब पे भारी।” अनिल अग्रवाल के इस भावुक संदेश में जहां अपने राज्य के प्रति गहरा प्रेम झलकता है, वहीं बिहार में निवेश के सीमित अवसरों को लेकर उनकी चिंता भी साफ दिखाई देती है।