बोलता सच,नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबले ने स्पष्ट किया है कि संगठन धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का समर्थन नहीं करता और हर नागरिक के अपने धर्म का पालन करने के संवैधानिक अधिकार का सम्मान करता है।
मेघालय के शिलांग में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विविधता और साझा सभ्यता पर जोर दिया।
शिलांग के ऐतिहासिक जुड़ाव का जिक्र
होसबले ने शिलांग के ऐतिहासिक महत्व को याद करते हुए कहा कि यह शहर स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस जैसी महान हस्तियों से जुड़ा रहा है।
उन्होंने बताया कि 1925 में स्थापना के समय RSS की केवल एक शाखा थी, जो आज बढ़कर देशभर में लगभग 85,000 दैनिक शाखाओं तक पहुंच चुकी है।
पूर्वोत्तर में बढ़ा संवाद, कम हुईं गलतफहमियां
पूर्वोत्तर भारत को लेकर पूछे गए सवालों पर उन्होंने कहा कि संपर्क अभियानों और संवाद कार्यक्रमों के जरिए RSS के बारे में फैली कई गलतफहमियां दूर हुई हैं। हालांकि, कुछ निहित स्वार्थों द्वारा दुष्प्रचार के कारण अब भी गलत सूचनाएं फैलती रहती हैं।
स्थापना के मूल उद्देश्य पर प्रकाश
होसबले ने कहा कि केशव बलिराम हेडगेवार ने यह समझने की कोशिश की थी कि इतनी समृद्ध सभ्यता होने के बावजूद भारत ने अपनी स्वतंत्रता कैसे खो दी। उनका मानना था कि सामाजिक बिखराव के कारण संगठित विदेशी शक्तियां यहां शासन करने में सफल रहीं। इसी सोच के चलते सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय जागरण के उद्देश्य से RSS की स्थापना हुई।
उन्होंने कहा कि RSS केवल एक संगठन बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि पूरे समाज को संगठित करने का प्रयास करता है।
विविधता में एकता पर जोर
होसबले ने कहा कि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है। खेलों में जीत या अंतरिक्ष मिशनों जैसे अवसरों पर यह एकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। RSS का लक्ष्य सामाजिक समन्वय और व्यक्तित्व निर्माण के जरिए इस एकता को और मजबूत करना है।
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